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Tuesday, 21 August 2018

आदिश्री अरुण का महा उपदेश, भाग - 33; MAHA UPADESH OF AADISHRI PART – 33


आदिश्री अरुण का महा उपदेश, भाग - 33

(आदिश्री अरुण)

आदिश्री अरुण का महा उपदेश, भाग - 33; MAHA UPADESH OF AADISHRI PART – 33
वर्तमान समय में आदिश्री के उपदेशों की अत्यन्त आवश्यकता है  क्योंकि आज मनुष्यों के नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है नई पीढ़ी अपनी पहचान खो रही है  आज आवश्यकता है कि आप स्वयं की संस्कृति को पहचानें, अपने इतिहास एवं 18  पुराणों का अध्ययन करें और उससे प्रेरणा ग्रहण करें आदिश्री का उपदेश भक्ति और प्रेम का दर्पण है  संसार को आज प्रेम की परम आवश्यकता है   

हिंसा और घृणा की अग्नि में झुलसते हुए प्राणी भक्ति के इस प्रेम सरोवर में स्नान करके शान्ति प्राप्त करे और ये उपदेश मानव समाज के लिए कल्याणकारी हो यही आदिश्री का कलियुग के लोगों के लिए अमृतमयी प्रसाद है 

जिसका  चित्त  एकमात्र ईश्वर पूर्ण ब्रह्म की भक्ति में लग गया हो वही भगवान की अहैतुकी भक्ति है भगवान की यह अहैतुकी भक्ति मुक्ति से भी बढ़ कर है कामना रहित ऐसी भक्ति है जिसका फल केवल्य मोक्ष है कामना रहित  भक्ति के द्वारा मनुष्य इसी जन्म में, इसी शरीर में, बिना मरे मोक्ष प्राप्त कर लेता है  वे ढृढ़ निश्चय वाले भक्त निरन्तर भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा भगवान की प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और भगवान को बार - बार प्रणाम करते हुए सदा भगवान के ध्यान में युक्त हो कर अनन्य प्रेम से भगवान की उपासना करते हैं वे अनायास ही  बिना मरे मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं 

भगवान् को किसी भी चीज से नहीं बाँध सकते हैं लेकिन वे प्रेम से बड़ी आसानी से बंध जाते हैं    (श्रीमद्भागवतम महा पुराण ) आप बल से एक या दो देशों को जीत सकते हैं लेकिन उन्हें हमेशा के लिए जिता नहीं जा सकता है परन्तु प्रेम से आप हमेशा के लिए सभी जीवों को जीत सकते हैं संसार को प्रमाण चाहिए  परन्तु  प्रेम प्रमाण  नहीं मांगती है  संसार के हर चीजों में बेचैनी है परन्तु प्रेम में शांति है
 
जो कोई भक्त प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि  अर्पण  करता है तो उस शुद्धि बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र  - पुष्पादि को भगवान् सगुन रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाते हैं  (गीता  9: 36 ) जो भक्त भगवान् में अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर  भगवान् को स्मरण करता है उसके लिए भगवान् सुलभ हैं अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाते हैं    (गीता  8: 14 )

ईश्वर ने प्रेम की महिमा को बताते हुए  कहा कि " मेरी चरण सेवा में प्रीति रखने वाले और मेरी ही प्रसन्नता के लिए समस्त कार्य करने वाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक दूसरे से मिलकर प्रेम  पूर्वक मेरे ही प्रकर्मों की चर्चा किया करते हैं, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्य मुक्ति) की भी इच्छा नहीं करते, वे साधुजन अरुण नयन एवं दिव्य मनोहर मुखारविन्दु से युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिव्य रूपों की झांकी करते हैं अर्थात मेरे वर देने वाले रूप अरुण का  दर्शन करते हैं और उनके साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते हैं जिसके लिए बड़े - बड़े तपस्वी भी लालायित रहते हैं । दर्शनीय अंग - प्रत्यंग, उदार हास - विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और इन्द्रयाँ फँस जाती है । मेरे भक्त ऐसी मेरी भक्ति न चाहने पर भी उन्हें परम पद की प्राप्ति करा देती है । " (श्रीमद्भागवतम महा पुराण 3;25:34 - 36) 

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