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Friday, 30 March 2018

MAHA UPADESH OF AADISHRI, PART - 21 /आदिश्री अरुण का महा उपदेश, भाग - 21

आदिश्री अरुण का महा उपदेश, भाग - 21

MAHA UPADESH OF AADISHRI, PART - 21 /आदिश्री अरुण का महा उपदेश, भाग - 21

अनामी लोक से चेतावनी

आज परमेश्वर मनुष्य का शरीर धारण कर पृथवी पर कल्कि  नाम से अवतरित हुए हैं। आज परमेश्वर आपके जीवन में प्रकाश बनकर उपस्थित हुए हैं। आज परमेश्वर आपके जीवन में ख़ुशी का फूल खिलाने  आए  हैं। आज परमेश्वर आपके जीवन के पथरीली, झाड़ी एवं चट्टानों से भरी भूमि को हरा - भरा बनाने  आए हैं। आज परमेश्वर आपको दुःख, पड़ेशानी एवं मृत्यु से बचाने आए हैं। परमेश्वर के  लिए न तो कोई कर्तव्य है और न उन्हें किसी चीजों को  प्राप्त करने की जरूरत ही है। (गीता ३:२२) फिर भी परमेश्वर समय - समय पर अवतार लेकर संसार  का हित करने के लिए सब कार्य  करते हैं।  जिस  युग में जितना कार्य आवश्यक है, परमेश्वर उसी के अनुसार अवतार लेकर उस कार्य को पूरा करते हैं। श्रीमद्भगवतम् महा पुराण १०;३३:३७ में महर्षि वेद व्यास जी ने कहा  कि "जीवों पर कृपा करने के लिए ही परमेश्वर अपने आपको मनुष्य रूप में प्रकट करते हैं और ऐसी - ऐसी लीलाएँ करते हैं जिन्हें सुनकर जीव भगवत्प्रायण हो जाय।" इस प्रकार परमेश्वर के अवतार लेने की दिव्यता को जानने से मनुष्य की परमेश्वर में भक्ति हो जाती है और भक्ति से ही परमेश्वर की प्राप्ति हो जाती है। भक्त के लिए तो परमेश्वर  का  नाम ही छुटकारे का  साधन है और परमेश्वर का नाम ही  भक्त का सौंदर्य है। परमेश्वर का नाम जप  ही शरीर के अन्दर तथा बाहर दोनों को सुन्दरता प्रदान करती  है। लेकिन परमेश्वर  के आराधना में  लोगों ने  लापरवाही की और उसके पूजा पद्धति में विकृति आगई है । याजक और जनसाधारण दोनों ही परमेश्वर के  शिक्षा के अनुकूल जीवन  न जीकर परमेश्वर को धोखा  दे रहे हैं। परमेश्वर के अनुसार मनुष्य न चल कर परमेश्वर के नजर में मुख्य ५ अपराध करते हैं:-

(१) मनुष्य जीवते परमेश्वर को छोड़कर मूर्ती पूजा करने  लगे। 
(२) मनुष्य परमेश्वर को छोड़कर ३३ करोड़ अर्ध देवताओं की पूजा करने लगे जिसके पास स्वयं अपनी कोई शक्ति नहीं है।  वे अर्ध देव  उसी परमेश्वर से शक्ति लेकर मनुष्य का कल्याण करते  हैं, उसको मनुष्य ने  परमेश्वर मान लिया और जो परमेश्वर हैं उनकी पूजा करना छोड़ दिया है    
(३) मनुष्य परमेश्वर के शिक्षा के अनुकूल जीवन न जीकर परमेश्वर को धोखा देते हैं और  उसने परमेश्वर के भवन में दशमांश भी देना बन्द कर दिया । 
(४) मनुष्य परमेश्वर के नजर में विश्वास योग्य नहीं रहे क्योंकि उसने परमेश्वर के द्वारा दिए गए पर्व - त्यौहारों को मनाना छोड़ दिया इसलिए वे परिवार समेत दंड के भागी हैं क्योंकि इस गलत कार्य में उनके परिवार के सदस्य भी शामिल हैं । 
(५) जब मनुष्य कष्ट एवं विपत्ति में था तब उसने मुझको मंदिरों में ढूंढा, मस्जिद में ढूंढा, गिरजाघर में ढूंढा, नदियों के जल में ढूंढा, सूर्य और चाँद में ढूंढा, पत्थरों में ढूंढा और मुझको कण कण में बसा दिया और जब वे कृपा करके उसको दुःख एवं  पदेशानियों से बहार निकाल दिया तब वह उनको  ही भूल गया  अब वह मनुष्य परमेश्वर के सभी नियमों का पालन  नहीं करते बल्कि उसका सब्सटीच्युट  ढूंढते हैं। 

हे मनुष्य ! परमेश्वर की नजर में मनुष्य के द्वारा किया गया अपराध ही मनुष्य को दुःख, विपत्ति एवं पड़ेशानियों में डाल रहा है। परमेश्वर के इच्छा की कोई शाब्दिक अभिव्यक्ति नहीं है। पूरे विश्व का प्रत्येक कार्य - व्यवहार उसके हुक्म में बंधा है, उससे बाहर कुछ भी नहीं है। मनुष्य अपनी अज्ञानता पर प्रसन्न होता है। माया - बंधनों में पड़ा जीव अहंकारवश परमेशर के कार्य - व्यापर को अपना किया बताते हैं, तो भी वह परमात्मा उन पर क्रोधित न होकर उनकी नासमझी पर मुस्कुराते  हैं 

परमेश्वर शांति के धनि हैं, परमेश्वर शांति के राजा  हैं, परमेश्वर के पास शांति रूपी धन है। जब तुम परमेश्वर के पास आओगे तब तुम शान्ति से भर जाओगे। परमेशर तुम्हारे घर में  शांति का बरसात करेंगे। ऊँची - ऊँची बातों को सुनना बहुत ही अच्छा  लगता है  पर कुछ  जमीनी  बातें भी हैं  जिसको व्यवहारिक जीवन में उतारना आवश्यक है।  यह सच है कि परमेश्वर आपके उदासी को हटा कर खुशियाँ देना  चाहते हैं। यह सच है कि परमेश्वर आपके जीवन  के दुःख को मिटा कर आनन्द देना चाहते हैं। परन्तु आप परमेश्वर के पास आना नहीं चाहते हैं और न परमेश्वर के घर में सेट्ल करना चाहते हैं। परमेश्वर ने जो वादा किया है अब वह वादे का दिन उपस्थित होने वाला है। परमेश्वर के उस वादे के दिन को ही क़ियामत का दिन कहते हैं। (कुरान, तर्जुमा, सूरः कमर ५४ का आयत ४६, पेज नम्बर - ८४६)

हे मनुष्य ! परमेश्वर ने कहा कि जिस समय मैं तुम्हें मिटाने लगूँ उस समय मैं आकाश को ढकूँगा और तारों को धुंधला कर दूँगा। मैं सूर्य को बादल से छिपाऊँगा और चन्द्रमा अपना प्रकाश न देगा। तेरे देश में अंधकार कर दूंगा। (धर्मशास्त्र, यहेजकेल ३२:७-८) परमेश्वर के उस भयानक दिन के आने से पहले सूर्य अँधियारा और चाँद लहू के जैसा लाल हो जायेगा। (धर्मशास्त्र, योएल २:३१  तथा प्रेरितों के काम २ :२०) परमेश्वर ने कहा  कि जिस महीने में यह घटना घटेगी, वह घटना उस महीने के १५ वें दिन घटेगी। उस समय मैं सूर्य को दोपहर के समय अस्त कर दुँगा और इस देश को मैं दिन दुपहरी अँधियारा कर दूंगा  (धर्मशास्त्रआमोस ८:९)      

समर्पण का नाम सभी ने सुना है । परन्तु समर्पण का वास्तविक अर्थ क्या है इस बात पर किसीने कभी गौर किया है आपका मन हमेशा ही ज्ञान की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है   आपको कभी  किसी अन्य शिष्य से ईर्ष्या हो जाता है कभी दिए गए टीचिंग पर संदेह हो जाता है और कभी गुरुदेव के द्वारा दिया गया दण्ड मन को विचलित कर देता है । न जाने कैसे - कैसे विचार आपके मन को भटकाते हैं और मन के इसी अयोग्य स्थिति के कारण आप ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि मन की योग्य स्थिति केवल समर्पण से ही निर्मित होती है ।

समर्पण मनुष्य के अहंकार तथा अज्ञान का नाश करता है । ईर्ष्यामहत्वकांक्षा इत्यादि भावनाओं को समर्पण दूर कर ह्रदय को शांत करता है  और  मन को एकाग्र करता है  । वास्तव में ईश्वर की सृष्टि में आज के मनुष्यों ने न ज्ञान की मर्यादा को बरक़रार रखी  है और न ज्ञानियों की । विषय ब्रह्म - ज्ञान का हो  या  जीवन के ज्ञान का या गुरुकुल में प्राप्त होने वाले ज्ञान काउसकी प्राप्ति के लिए सबसे अधिक महत्त्व है गुरु के प्रति आपका समर्पण । समर्पण  कैसे हो सकता है इस सम्बन्ध में ईश्वर ने कहा कि समर्पण के लिए चार चीजों को देना अनिवार्य है  क्या तुम  इन चार चीजों दे सकते हो वह चार चीज है - " तू मुझमें मन वाला होमेरा भक्त बनमेरा पूजन करने वाला हो और केवल मुझको ही प्रणाम कर । "  (गीता 18 : 65 )     

अब दूसरा महत्वपूर्ण और निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या संसार में केवल सुख का होना संभव नहीं है जबाब अति सरल  है - प्रत्येक आत्मा का लक्ष्य तो केवल सुख की प्राप्ति ही तो है - पमानन्द की प्राप्ति । किन्तु आप सुख नहीं बल्कि सुख को प्रदान करने वाली वस्तुओं को एकत्रित करना जीवन का उद्देश्य मान लेते हो। यह समस्त संसार माया हैसब कुछ नाशवान हैंजिन वस्तुओं को आप सुख का स्रोत समझ कर एकत्र करना चाहते हो वह सब नहीं रहेंगे । जो इस सत्य को जानते हुए भी इस रोग का नाश नहीं करते वो सदैव इन वस्तुओं को खोने के भय में जीते हैं और जो व्यक्ति इस सत्य को जानते ही नहीं वह अहंकार में जीते हैं। जहाँ अहंकार और भय उपस्थित हो वहाँ सुख किस प्रकार रह सकता है किसी को यह दुःख है कि उसके पास कुछ भी नहीं हैऔर जिसके पास सब कुछ है तो उसे यह दुःख है कि पाने को कुछ शेष नहीं    सुख को आप स्वयं के दृष्टिकोण से परिभाषित कर देते हैं जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है । इसलिए आवश्यकता है अनाशक्त रहने की । किन्तु क्या हे मनुष्य ! आसक्ति स्वाभाविक  है ?  नहीं,  और दुःख का मूल कारण ही तो  आशक्ति है । आशक्ति आपके मन की शांति को छीन लेती हैउसे भांग कर देती हैआपके बुद्धि को स्थिर नहीं रहने देती हैउसे चंचल बना देती हैआशक्ति से प्रमाद की उत्पत्ति होती हैप्रमाद से मद की उत्पत्ति होती है और मद अहंकार का स्रोत है । अहंकार पूर्णतया  अशुभता में परिवर्तित हो जाता है अर्थात अहंकार अशुभता की जननी है । इसलिए आसक्ति अनावश्यक है ।

अब प्रश्न यह उठता है  कि  आसक्ति को अनाशक्ति में कैसे परिवर्तित किया जा सकता है अथवा आशक्ति से आप कैसे मुक्त हो सकते हैं आशक्ति से मुक्त होना ही अनाशक्ति है । आशक्तिहीन होने के लिए अपने और पराये का भेद मिटाना अनिवार्य है और यह तभी संभव होगा जब आप सुख की खोज बाहर नहीं अपने भीतर करें । जब आप वास्तविकता को पहचान लें तो उसको स्वीकार कर लें और अपने सुख को सांसारिक तत्वों से परिभाषित नहीं करें ।  जब तक आप ऐसा करते रहेंगे तब तक आप बंधते जाएँगे । जब आप स्वयं अपने भीतर झांकना आरम्भ करेंगे तो आपके मुक्ति का मार्ग स्वतः प्रशस्त होता जाएगा ।

हे मनुष्य ! आपने ने तो दुःख का कारण जान लिया किन्तु अब भय का कारण भी जानिए । भय का स्रोत है इच्छा । यदि पाने की इच्छा होगी तो उसे खोने का भय भी होगा । यदि जीवित रहने की इच्छा है तो मृत्यु का भय भी अवश्य होगा । किन्तु  केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि देवता और गन्धर्व सभी इस भय से ग्रसित हैं । किन्तु इच्छाओं से मुक्त कोई भी नहीं । इच्छाईर्ष्याद्वेषदूसरों की निंदा और संयन्त्र  जैसे पाप भय से ही उत्पन्न होते हैं और प्रत्येक पाप का प्रायश्चित केवल दुःख और कष्ट उठाने से ही संभव होता है  । इसलिए भय भी अंत में दुःख का कारण बन जाता है। 


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