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Thursday, 15 February 2018

Maha Upadesh of Aadishri, Part – 6 (New) ; आदिश्री के महा उपदेश, भाग - 6 (New)


Maha Upadesh of Aadishri, Part – 6 (New) ; आदिश्री के महा उपदेशभाग - (New)

 (आदिश्री अरुण )

Maha Upadesh of Aadishri, Part – 6 (New) ; आदिश्री के महा उपदेश, भाग - 6 (New)


मन का स्वभाव  ही है चंचलता । गीता अध्याय 6 : 34  इस कथन की पुष्टि करते हुए  कहा कि यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा ढृढ़ और बलवान है  । अब बच्चे को देखिए । उनके माता - पिता कहेंगे कि झील के पास मत जा, जंगल में मत खेलना, तो वह बच्चा निश्चित ही वही करेंगे जिसके लिए उसे मना किया गया है । बन्धन को तोड़ने में ही मनुष्य को बड़ा मजा आता  है बल्कि  मनुष्य को  बन्धन को तोड़ने के लिए मन बड़ा ही ललचाता है । मन जब भ्रमित होता है तब वह सोचने समझने की  क्षमता को खो देता है  । वह भ्रम से मायाजाल में फस जाता है  । अब प्रश्न यह उठता है कि मन शांत कैसे रहे ? उत्तर बड़ा ही सरल है । धीरज रखने से मन शान्त रहता है, आप एकाग्रचित हो जाते हैं,  भ्रम के मायाजाल से निकलकर अपने लक्ष्य को देख पाते हैं । इसलिए धीरज रखना सीखें । चुकि धीरज बहुत बड़ी शक्ति है इसलिए मनुष्य को इसे अपने व्यवहारिक जीवन में उपयोग करना चाहिए ।

कई बार मनुष्य अपने लक्ष्य के बहुत करीब होता है पर अचानक वह मार्ग बंद हो जाता है या फिर वह मनुष्य भ्रम में फस जाता है, कभी - कभी उस भ्रम से जूझकर मनुष्य हार मान लेता है और कभी - कभी उस भ्रम को ही मनष्य अपना लक्ष्य समझ लेता है  और  ऐसी स्थिति में मनुष्य का लक्ष्य उससे दूर होता चला जाता है । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या किया जाय ?  उत्तर है धैर्य ।  धैर्य तब उत्पन्न होगा जब मन को बन्धन में डालें । मैं मानता हूँ कि मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा ढृढ़ और बलवान है  परन्तु यह अभ्यास  से ही वश में होता है । गीता 6 : 35 इस कथन की पुष्टि करता है  । लेकन बन्धन और मर्यादा में बड़ा अन्तर है । कभी - कभी बन्धन  तोड़ना उचित होता है परन्तु मर्यादा तोड़ना उचित नहीं  चाहे वह प्रेम की हो, चाहे वह शत्रुता की हो, चाहे वह अतिथि की हो, चाहे वह बाप - बेटा का हो, चाहे वह सास - बहु की  हो,  चाहे वह गुरु - शिष्य का हो । अब प्रश्न यह उठता है कि मर्यादा है क्या ?  हमें कैसे मालुम हो कि हमें किस सीमा को नहीं तोड़ना चाहिए ?  इसका उत्तर बड़ा ही सरल है । जैसा व्यवहार आप किसी दूसरे से उम्मीद करते हैं कि वह मनुष्य आपके साथ करे वास्तविकता में वही आपकी भी मर्यादा है । जो सीमा आप किसी दूसरे को पार नहीं करने देना चाहते हैं वही सीमा आपकी भी है । जिस दिन से आप अपनी मन से यह प्रश्न करना प्रारम्भ कर देंगे उस  दिन से न आपसे कोई मर्यादा भंग होगी और न ही आपसे कोई अपराध होगा । इसलिए कहा गया है कि जब आपका मन नियंत्रण में हो  तो आपके ह्रदय के साथ - साथ आपके मन में भी ईश्वर निवास करेंगे । तब यदि आप अपने मन से  मर्यादा का उत्तर पूछेंगे तो आपका मन आपको कभी भी अनुचित उत्तर नहीं देगा ।

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