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Saturday, 19 November 2016

AADISHRI ARUN HAS COME TO SAVE YOU FROM DEATH

AADISHRI ARUN HAS COME TO SAVE YOU FROM DEATH

आदिश्री अरुण आपको  मृत्यु से बचाने आया है 

AADISHRI ARUN HAS COME TO SAVE YOU FROM DEATH
परमेश्वर का वचन मनुष्य के जीवन में अहं भूमिका निभाता है । परमेश्वर का वचन मनुष्य के जीवन में केवल सुख - शान्ति,  खुशीयाँ और आनंद लेकर ही नहीं आता बल्कि परमेश्वर का वचन मनुष्य के लिए जीवन भी लेकर आता है । लेकिन सबाल यह उठता है कि जो व्यक्ति परमेश्वर के वचन को तुच्छ समझता है और जो व्यक्ति परमेश्वर के वचन को नहीं मानता है वह किस प्रकार जीवित रह सकता है ? उसको तो मरना ही होगा । क्योंकि परमेश्वर की आज्ञा को नहीं मानना सबसे बड़ा पाप है और पाप की मजदूरी मृत्यु है । (धर्मशास्त्र, रोमियों 6:23 )

श्रीमद्देवी भागवतम,  स्कन्ध - 7, शीर्षक "हिमालय के घर देवी का प्राकट्य" पे० न ० 553  में यह कहा गया है कि जो माया के साथ  रहता है उसको ईश्वर (परमेश्वर ) कहते हैं ; उस ईश्वर को  परब्रह्म की  पूर्ण जानकारी रहती है । वह सर्वज्ञानी, सबका उत्पादक तथा सब पर कृपा करने वाला है । गीता 7:6 के अनुसार क्षीरदकोसयी विष्णु ही ईश्वर पुत्र या ईश्वर या परमात्मा है । धर्मशास्त्र में  ईश्वर पुत्र को  ईश्वर के सदृश कहते हैं  । (धर्मशास्त्र, कुलिससियों 1:15) 

आज के समय में अधिकतर व्यक्ति ईश्वर पुत्र के वचन को तुच्छ समझते हैं और ईश्वर पुत्र की बातों को नहीं मानते हैं । ईश्वर की व्यवस्था को तोड़ना और ईश्वर पुत्र की बातों को नहीं मानना ऐसा गलती व पाप है जिसकी मजदूरी मृत्यु है । इसलिए ऐसा गलती करने वाले लोगों को मरना ही पड़ता है । जब लोग मर जाते हैं तो उनके गलतियों को नहीं देखते हैं और कहते हैं कि अमुक व्यक्ति मर गया । चलो ईश्वर पुत्र के पास; ईश्वर पुत्र इसको जीवित करेंगे ।  लेकिन वे यह नहीं सोचते हैं कि ईश्वर पुत्र ने पाप करने से मना किया तो हम पाप क्यों करें जिसके चलते मरना पड़े ? 

क्या आपने तहकीकात किया कि अमुक व्यक्ति क्यों मर गया ? मनुष्य पाप क्यों करता है कि उसको मरना पड़े । अगर कोई अमुक व्यक्ति मर जाता है तो आप ईश्वर पुत्र पर दोष  क्यों लगाते  हैं ? क्या मरने वाला व्यक्ति ईश्वर पुत्र से पूछ कर पाप किया ? परमेश्वर की व्यवस्था में पाप की मजदूरी मृत्यु है । (धर्मशास्त्र, रोमियों 6:23 ) अब तो वह मरेगा ही। ईश्वर पुत्र उन पाप करने वाले को जीवन किस प्रकार दे सकते हैं ? 

सब जानते हैं कि जहर खाने से लोग मर जाते हैं तो आप जहर क्यों खाते हैं ? सब जानते हैं कि पाप करने से लोग मर जाते हैं तो आप पाप क्यों करते हैं ? जब ईश्वर या ईश्वर पुत्र की  आज्ञा को नहीं मानना सबसे बड़ा पाप है तो आप ईश्वर या ईश्वर पुत्र की आज्ञा को क्यों ठुकरा देते हैं ?

यदि आपको जीवन चाहिए तो आपको पवित्र बनना पड़ेगा । ईश्वर पुत्र ने यह कभी नहीं कहा कि तुम पाप करो और मर जाओ और मैं तुमको जीवित कर दूंगा। यदि कोई पवित्र मनुष्य मर जाता है तो उसके लिए ईश्वर पुत्र ने कहा कि "मैं तुम्हें  मृत्यु के मुख से छीन कर वापस ले आऊंगा" क्योंकि जिस रीती से पिता अपने आप में जीवन रखता है, उसी रीती से उसने पुत्र को भी यह अधिकार दिया है कि अपने आप में जीवन रखे। (धर्मशास्त्र, यूहन्ना 5 :26) जैसा पिता मरे हुओं को उठता और जिलाता है वैसा ही पुत्र भी जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है। (धर्मशास्त्र, यूहन्ना 5 :21)  ईश्वर पुत्र ने यह बात कभी नहीं कहा कि तुम पाप करो तो भी  मरनेके बाद मैं तुम्हें जीवित कर दूंगा; तुम ईश्वर या ईश्वर पुत्र के आज्ञाओं को नहीं मानोगे  तो भी  मरनेके बाद मैं तुम्हें जीवित कर दूंगा । 

ईश्वर पुत्र तुम्हें अनंत जीवन देने आए हैं और अनंत जीवन पाने के लिए तुम्हें पवित्र बनना पड़ेगा, तुम्हें पाप मुक्त जीवन जीना होगा । ईश्वर ने कहा कि  आज्ञाकारी बालकों की तरह अपनी अज्ञानता के समय की पुरानी अभिलाषाओं के सदृश (समान) न बनो पर जैसे तुम्हारे बुलाने वाला पवित्र है , वैसे ही तुम भी अपने सारे चालचलन में पवित्र बनो क्योंकि मैं पवित्र हूँ (धर्मशास्त्र, 1 पतरस 1: 14  - 16)

पूर्व समय में अदन बाटिका में आदम और हव्वा ने ईश्वर का कहना नहीं मानाने के कारण पाप किया जिसके चलते उन दोनों को मृत्यु की सजा मिली और वे जन्मने - मरने वाले शरीर में आगए । उस दिन भी ईश्वर ने उसे मृत्यु से नहीं बचाया । आज फिर ईश्वर पुत्र ने आपको समझाया कि पाप नहीं करो क्योंकि पाप की मजदूरी मृत्यु है और ईश्वर की बात को नहीं मानना सबसे बड़ा पाप है। अगर आज फिर ईश्वर पुत्र की बात नहीं मानते हो तो मृत्यु से आपको कोई नहीं बचा सकता है । इसलिए तुम या कोई भी व्यक्ति यदि पाप करने के कारण मर जाते हो तो जीवन पाने के लिए ईश्वर पुत्र के पास अर्जी नहीं लगाओ और न तर्क - वितर्क करके मन को अशांत करो और न  ईश्वर पुत्र के सामर्थ्य को व्यर्थ चुनौती दो क्योंकि प्रत्येक काम न्याय के अनुसार किया जाता है। इनके घर पैड़वी नहीं चलती, इनके लिए छोटे - बड़े सभी एक सामान हैं। 
  
मनुष्य केवल रोटी से ही जीवित नहीं रहता, परंतु जो - जो वचन परमेश्वर के मुख से निकलते हैं उन्हीं से वह जीवित रहता है। (धर्मशास्त्र, व्यवस्थाविवरण 8:3) परमेश्वर ने कहा कि मेरी सब विधियों का पालन करो तो जीवित रहेगा। (धर्मशास्त्र, यहेजकेल 18 :20) वह हर एक को उसके कामों  के अनुसार बदला देगा। (धर्मशास्त्र, रोमियों 2 :6) जो मनुष्य परमेश्वर के वचन को तुच्छ जनता है और परमेश्वर की  आज्ञा को टालता है वह प्राणी निश्चित ही मरता है । धर्मशास्त्र, गिनती 15:31 इस बात की पुष्टि करते हुए यह कहता है कि वह जो परमेश्वर का वचन तुच्छ जानता है और जो परमेश्वर की आज्ञा को टालने वाला है वह प्राणी निश्चित नाश किया जाए । पमेश्वर की आज्ञा मूसा की व्यवस्था की पुस्तक में लिखी है कि  - पुत्र के कारण पिता न मार डाला जाय और पिता के कारण पुत्र न मार डाला जाय बल्कि जिसने पाप किया हो वही उस पाप के कारण मार डाला जाय । (धर्मशास्त्र, 2 राजा 14:6) इसी बात को व्यवस्थाविवरण 24 :16  में भी वर्णन किया गया है । 

जियो ऐसे कि तुम भगवान का आज्ञाकारी कहलाओ, परमेश्वर के वचन का पालन करने वाला समझे जाओ और लोगों के जबान पर ईश्वर के सब नियमों को मानने वाले कहा जाओ। परमेश्वर की व्यवस्था में तुम चलने वाला बनो । तब  तुम्हारा नाम हमेशा के जीने वाले लिस्ट में होगा।   जैसे - परशुराम जी, हनुमान जी, कृपाचार्य, महाबली, अश्वस्थामा, विभीषण, व्यास, वसिष्ट, अकृतवर्ण, मधुच्छन्द, मन्दपाल , मार्कण्डेय, देवापि, मरू, सप्तऋषि इत्यादि 1 5 का नाम हमेशा के जीने वाले लिस्ट में है  । ये लोग आज भी जीवित हैं । यदि तुम सचमुच मरना नहीं चाहते हो, यदि तुम भी सचमुच चिरंजीवी होने का आशीर्वाद पाना चाहते हो तो इन 15 लोगों के जीने की कला को समझो और अपने जीवन में उतारो और फिर तुम भी जीवित रहो । चुकि ये नहीं मरते इसलिए तुम भी नहीं मरोगे ।           

परमेश्वर की व्यवस्था में सबसे पहला काम है पमेश्वर के वचन को सुनना, दूसरा काम है उनके वचन को स्वीकार करना और तीसरा काम है उनके वचन का अपने दैनिक जीवन में पालन करना । जो व्यक्ति रात - दिन परमेश्वर की व्यवस्था पर ध्यान करते रहता है और अपने जीवन को परमेश्वर की व्यवस्था पर नियंत्रित रखकर कार्य करता है वह प्रसन्न रहता है । (धर्मशास्त्र, भजन संहिता 1:2-3) क्योंकि उसके पास मृत्यु नहीं आएगी। 

परमेश्वर ने वचन दिया कि "मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं परंतु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, उससे जीवित रहेगा। (धर्मशास्त्र, मत्ती 4:4) 
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