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गीता सार, अध्याय - 7

गीता सार

अध्याय 7

(ईश्वर पुत्र अरुण)
गीता सार - अध्याय 7 में भगवन श्रीकृष्ण ने  मार्ग दर्शन किया कि जो मनुष्य अनन्य चित्त होकर सदा ही नित्य-निरन्तर मुझ ईश्वर को स्मरण करता है, जो नित्य-निरन्तर ध्यान के द्वारा मुझ में ही अपने आपको नियुक्त किये हुए है, उसको मैं सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ । वह मनुष्य मुझको प्राप्त होकर दुखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता है ।   

लेकिन हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले मनुष्यों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थरूप से जानता है। पूर्व काल में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परंतु मुझको कोई भी श्रद्धा - भक्तिरहित पुरुष नहीं जनता।

मैं अपनी योगमाया से छिपा हुआ सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जान समुदाय मुझ जन्म रहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने - मरने वाला समझता है। चुकि तुम अनन्य प्रेम से मुझमें असक्तचित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ है इसलिए मैं तुझ डिश दृष्टि से रहित भक्त के किए परम गोपनीय  विज्ञान सहित ज्ञान कहूंगा, जिसको जानकार तू दुःख रूप संसार से मुक्त हो जाएगा। यह ज्ञान सबसे उच्चतम श्रेणी (Highest quality) का ज्ञान है।  
तेरे लिए मैं इस विज्ञान सहित तत्वज्ञान को सम्पूर्णतया से कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता । यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है । इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परम गोपनीय  विज्ञान सहित ज्ञान दिया जिसको जानने के बाद और किसी ज्ञान कि जरुरत ही नहीं है। 

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सारी कायनात की रचना का ज्ञान देते हुए कहा की मैं ही सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ । उन्होंने यह भी कहा कि सारी कायनात की रचना मेरे जड़ प्रकृति (Lower Energy) और  के मिलने से हुई है ।  जड़ प्रकृति (Lower Energy) से रचना का काम होता है तथा चेतन प्रकृति (Higher Energy) रचना कार्य (Function) करता है तथा मैं (Super Soul) रचना के हरएक परमाणु के जर्रे - जर्रे में समाया। जो इस भेद को जान जाता है उसको  मुक्ति मिल  जाती है ।   
भगवन श्रीकृष्ण ने कहा कि संसार में चार प्रकार के भक्त हैं - (1) अथार्थी - सांसारिक पदार्थों के लिए भजने  वाला (2) आर्त - संकट निवारण के लिए भजने  वाला (3) जिज्ञासु - मेरे को यथार्थ रूप से जान्ने कि इच्छा से भजन वाला और (4) ज्ञानी; लेकिन उनमें जो नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है, क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है ।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जब मैं ही सब कुछ हूँ तो देवताओं को कौन पूजता है ? जिस मनुष्य के अंदर भोग - भोगने कि कामना है। उन्होंने साफ़ - साफ़ शब्दों में कहा कि भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वाभाव से प्रेरित होकर उस - उस नियम को धारण करके अन्य-अन्य  देवताओं को पूजते हैं  । जो - जो सकाम भक्त जिस - जिस देवता के स्वरुप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस - उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ । वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है ।
परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं  को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे भजें, अंत में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं । उन्होंने इस बात को एकदम स्प्ष्ट करते हुए कहा कि - "देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाला भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं । इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।"

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि  माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका  है, ऐसे आसुर-स्वाभाव (राक्षस स्वाभाव) को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते ।                                 

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