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शाश्वत धर्म की स्थापना


एक जाति, एक धर्म और केवल एक भगवान की भावना का बीज  केवल जूनून के तूफ़ान से ही बोया  जा सकता है , लेकिन केवल वो जो खुद जुनूनी होते हैं केवल  वही दूसरों में जूनून पैदा कर सकते हैं । मेरा मानना ​​है कि आज मेरा आचरण सर्वशक्तिमान निर्माता की इच्छा के अनुसार है। सफलता ही सही और गलत का एकमात्र सांसारिक निर्णायक है । लोगों के मन में अनेक धर्म, अनेक जाति  का विश्वास  विशाल पौधा के रूप में जड़ जमा लिया है और  हमेशा ही विश्वास के खिलाफ लड़ना ज्ञान के खिलाफ लड़ने से अधिक कठिन होता है। संघर्ष सभी चीजों का जनक है । मानवजाति शाश्वत धर्म के संघर्ष  से शक्तिशाली हुई है और ये सिर्फ अनंत शांति के माध्यम से  अनेक धर्म, अनेक जाति  का विश्वास रूप  विशाल पौधा को उखाड़ कर फेका जा सकता है । शब्द सूरत योग के माध्यम से अनंत शांति की ओर ले जाया जा सकता है और लोगों के मन में उपधर्म की जगह  शाश्वत धर्म का झंडा लहराया जा सकता है । जो शाश्वत धर्म पर चलकर जीना चाहते हैं उन्हें लड़ने दो और जो उपधर्म वाली इस दुनिया में नहीं लड़ना चाहते हैं उन्हें जीने का अधिकार नहीं है । सच्चाई यह है कि सभी मनुष्य की आत्मा केवल प्रकाशमय अथाह एवं अनंत माह सागर का प्रकाश बून्द है । यह आत्मा शरीर का पोशाक पहनकर कर्मा के अनुसार "जीवन नाटक" का प्राप्त भूमिका निभाने का अभिनय कर  रही है । परन्तु आत्मा की भिन्न - भिन्न जातियाँ और भिन्न - भिन्न धर्म नहीं हो सकते हैं । समाज में छाई इस विभिन्नता को मिटा कर शाश्वत धर्म की स्थापना करना समय की मांग है ...... आदिश्री अरुण
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