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Friday, 10 June 2016

आदि सत्य




आदि श्री अरुण : जब दो व्यक्ति एक दूसरे के निकट आते हैं तो एक दूसरे के लिए सीमायें और मर्यादाएँ निर्मित करने का प्रयास करते हैं।आप  यदि सारे संबंधों पर विचार करें तो देखेंगे कि सारे संबंधों का आधार यही सीमायें हैं जो स्वयं आप दूसरों के लिए निर्मित करते हैं और यदि अनजाने में भी कोई व्यक्ति इन सीमाओं को तोड़ता है तो उसी क्षण आपका ह्दय क्रोध से भर जाता है। किन्तु इन सीमाओं का वास्तविक रूप क्या है ? सीमाओं के द्वारा आप दूसरे व्यक्ति को निर्णय करने की अनुमति नहीं देते बल्कि आप अपना निर्णय  व्यक्ति पर थोपते हैं। यानि कि किसी की स्वतंत्रता का अस्वीकार करते हैं और जब स्वतंत्रता का अस्वीकार किया जाता है तब उस व्यक्ति का ह्रदय दुःख से भर जाता है और जब वह व्यक्ति सीमाओं को तोड़ता है तो आपका मन क्रोध से भर जाता है। क्या ऐसा नहीं होता? पर यदि एक दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाय तो मर्यादाओं या सीमाओं की आवश्यकता ही नहीं होती। अर्थात जिस प्रकार स्वीकार किसी संबंध का देह है तो क्या वैसे ही स्वतंत्रता किसी संबंध की आत्मा नहीं?  


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