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गीता का पालनीय सिद्धान्त

गीता  का सिद्धान्त है मनुष्य को निष्काम भाव से स्वकाम में प्रविर्त रहकर चित्तशुद्धिका उपाय करना। क्योंकि अगर कोई मनुष्य तत्व से ईश्वर को जान  भी लेता है और यदि उसका अंतः कारण शुद्ध नहीं है तो लाख कोशिशें करने के बाद भी वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता है। इस सिद्धांत में यह भी शामिल है कि जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण  जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वभाविक कर्मों के द्वारा पूजा करना चाहिए ।  जिन साधनोंका फल अनित्य है वे मोक्षके कारण हो ही नहीं सकते। मोक्षका स्वरूप है जीवात्मा परमात्माकी अभिन्नता का ज्ञान। दोनों एक स्वरूप हैं, इसी ज्ञान का नाम मोक्ष है। बिना इन्तजार किए मनुष्य को कर्म के फल का त्याग कर देना चाहिए  क्योंकि कर्म के फल का त्याग नहीं करने वालों को अच्छा, बुरा और  अच्छा - बुरा मिला हुआ तीन प्रकार का फल मरने के बाद अवश्य ही प्राप्त होता है। देखो ! जिस प्रकार  पके फल  वृक्ष से अपने आप ही गिर पड़ते हैं और वह संसार से  सर्वथा निर्लिप्त हो जाता है। लोहेके तप्त गोले को हाथसे छोड़ देने के लिये किसके आदेशकी प्रतीक्षा होती है? ठीक उसी प्रकार कर्मों के फल का त्याग करने के लिए तुम किसकी प्रतीक्षा करते हो ? हे मनुष्य ! किसी भी चीज में  तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए । यही मोक्ष प्राप्त करने  का मूल सिद्धांत है - आदिश्री अरुण  
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