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Saturday, 11 June 2016

मार्ग

आदि श्री अरुण : यह सत्य है कि पिता हमेशा ही अपनी सन्तान के सुख की कामना करते हैं, उनके भविष्य की चिन्ता करते  हैं। इसी कारणवश वे अपने सन्तानों के भविष्य का मार्ग स्वयं निश्चित करने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस मार्ग पर पिता स्वयं चला है, जिस मार्ग के कंकड़पत्थर को स्वयं देखा है, मार्ग की छाया मार्ग की धूप को स्वयं जाना है हर पिता की यही इच्छा रहती है कि उसका पुत्र भी उसी मार्ग पर  चले   निःसंदेह यह उत्तम भावना है  किन्तु तीन प्रश्नों के ऊपर विचार करना वे भूल ही जाते हैं -
पहला क्या समय के साथ - साथ प्रत्येक मार्ग बदल नहीं जाते? क्या समय हमेशा ही नई चुनौतियों को लेकर नहीं आता? तो फिर बीते हुए समय के अनुभव नई पीढ़ी को किस प्रकार लाभ दे सकते हैं?
दूसरा क्या प्रत्येक सन्तान अपने माता- पिता की छवि होता है? हां संस्कार तो सन्तानों को अवश्य माता-पिता देते हैं। किन्तु भीतर की क्षमता तो स्वयं ईश्वर देते हैं। तो जिस मार्ग पर पिता को सफलता मिली है तो  जरुरी नहीं है कि उसी मार्ग पर उसकी सन्तानों को भी सफलता और सुख प्राप्त होगा?
तीसरा क्या जीवन का संघर्ष और चुनौतियाँ लाभकारी नहीं होती?  क्या प्रत्येक नया प्रश्न प्रत्येक नये उत्तर का द्वार नहीं खोलता? तो फिर सन्तानों को नई-नई चुनौतियों और नए ए प्रश्नों से दूर रखना ये उनके लिए लाभान्वित कहलागा या हानि पहुँचाना कहलागा अर्थात जिस प्रकार मनुष्य के भविष्य के मार्ग का निर्माण करना श्रेष्ठ है वैसे ही सन्तानों के जीवन का मार्ग निश्चित करने के बदले उन्हें नये संघर्षो के साथ जूझने के लिए मनोबल और ज्ञान देना अधिक लाभदायक नहीं होगा
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