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Monday, 9 May 2016

भूमि के प्रश्न और आदि श्री का जबाब


भूमि : आदि श्री अरुण जी के चरणों में कोटि - कोटि प्रणाम। मैं अपने

आपको बहुत ही निर्बल समझने लगी  हूँ। मेरा घर बिखर गया है। लाख

चतुराई करने के बाबजूद भी मैं किसी भी समस्या का हल नहीं निकाल 

सकी । घर में बात - बात पर झगड़ा होता है। घर के लोग केवल झगड़ने 

में लगे हैं। आपस में फुट है और सभी लोग अप्रिय बातों को बोलने में ही

अपना शान समझते हैं। घर के खर्च अचानक बहुत बढ़ गए हैं। घर में कोई

भी लोग इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। आदि श्री जी ,घर के 

ऐसे वातावरण में हम कैसे सबसे मिलकर रहें और इस विषम परिस्थिति 

को कैसे संभालें इसके लिए हमें मार्गदर्शन कीजिए। 


आदि श्री अरुण : घर के 

लोगों में दोष निकालना 

किसी भी समस्या का हल

नहीं है। ऐ भूमि जी, तुम

शरीर नहीं हो। तुम एक 

आत्मा हो। ऐसा कभी मत सोचो कि आत्मा के लिए कोई भी कार्य करना असंभव है।  ऐसा सोचना सबसे बड़ा अधर्म है। अगर कोई  पाप है तो वो यह कहना कि "तुम निर्बल हो
ऐ भूमि जी ! उठो, इस भ्रम को मिटा दो कि "तुम निर्बल हो"। तुम एक अमर आत्मा हो।  तुम एक स्वच्छंद जीव हो।  तुम धन्य हो और तुम सनातन हो। तुम तत्व  नहीं हो बल्कि तत्व तुम्हारा सेवक है, तुम तत्व के सेवक नहीं हो। सब तरह के सोच मन से उत्पन्न होते हैं। अगर किसी तरह परिवार वाले का मन परिवर्तित हो जाय तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा। मन परिवर्तित तब हो सकता है जब किसी का विचारधारा उसके मस्तिष्क और नस - नस पर अपना अधिकार कर ले। इसके लिए उन लोगों को आदि श्री के शरण में आना होगा । तब तक के लिए तुम्हें  मेरी शिक्षाओं का पालन करना  अनिवार्य है जो  निम्न प्रकार वर्णित हैं :      

अपने बराबर या फिर अपने से ज्यादा समझदार व्यक्तियों के साथ जीवन का सफर 

तय करो, मूर्खो के साथ जीवन का सफ़र तय करने से अच्छा है अकेले जीवन का 

सफ़र तय करना। उसने मेरा अपमान किया, उसने मुझे कष्ट दिया,  उसने मेरी 

निन्दा की, उसने मेरी बेज्जती की ”- जो व्यक्ति जीवन भर इन्हीं बातों को लेकर

शिकायत करते रहते हैं, वे कभी भी चैन से नहीं रह पाते हैं । सुकून से वही व्यक्ति 

रहते हैं जो खुद को इन बातों से ऊपर उठा लेते हैं। जिस तरह तूफ़ान एक मजबूत 

पत्थर को हिला नहीं पाता है , ठीक उसी तरह  महान व्यक्ति, तारीफ़ या आलोचना 

से प्रभावित नहीं होते। जिस व्यक्ति का मन शांत होता है और बोलते समय और 

अपना काम करते समय जिस व्यक्ति का मन शांत रहता है केवल वही 

व्यक्ति सच को हासिल कर लिया है और वो  दुःख-तकलीफों से मुक्त हो चुका है 

 हर हमेशा कोई भी काम शुरू करने के पहले अपने आपसे तीन सवाल पूछो — मैं 

ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? ऐसा करने से क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल 

 होऊँगा ?” भय को नजदीक आने दो अगर यह नजदीक आये तो इस पर हमला 

कर दो  यानी भय से भागो मत इसका सामना करो। ऐसी विषम परिस्थिति में 

किसी भी प्रकार का कर्ज मत लो। ऐसी विषम परिस्थिति में घर के लोग  घर 

में बिना मतलब का रुपया खर्च करने लग जाते हैं। इस कारण घर की  आर्थिक 

 स्थिति  बहुत ही  ख़राब हो जाती है। घर की आर्थिक स्थिति को ठीक  करने के 

लिए कर्ज कभी भी न लो  बल्कि घर के होने वाले खर्चों में कटौती करो । जिस प्रकार

पत्नी के वियोग का दुख और अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय 

होता है। ठीक  उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी ही रहता है। जो 

मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य  को 

 बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। स्त्रियाँ ही घर को बनती है और 

स्त्रियाँ ही घर को बिगार  देती है। परन्तु  सब स्त्रियाँ ऐसी नहीं होती है । वो स्त्रियाँ 

लक्ष्मी समान होती है जो घर को संभाल कर रखती है। अधिकतर स्त्रियों में झूठ 

बोलनाउतावलापन दिखाना, दुस्साहस करनाछल-कपट करना, मूर्खता पूर्ण कार्य 

करनालोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता का होना – उसके स्वभाविक दोष हैं। 

इसलिए स्त्रियों की बातों को तो सुनो जरूर परन्तु अपने ज्ञान और समझ 

का प्रयोग करो। जिस व्यक्ति का पुत्र अपने माता  - पिता के नियंत्रण में रहता है

और उसकी पत्नी अपने सास -ससुर के नियंत्रण में रहती है। जो व्यक्ति अपने 

धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान 

 है। केवल वही गृहस्थी सुखी हैजिसके  संतान अपने माता - पिता के आज्ञा का 

पालन करता  है।





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