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कल्कि जयन्ती मनाने हेतु आदि श्री अरुण की शिक्षा

हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है। एक विचार लो. उस  विचार  को  अपना जीवन  बना  लो – उसके  बारे  में  सोचो  उसके  सपने  देखो , उस  विचार  को  जियो। अपने  मस्तिष्क,  मांसपेशियों , नसों , शरीर  के  हर  हिस्से  को  उस विचार में  डूब  जाने  दो , और  बाकी  सभी विचार  को  किनारे  रख  दो। यही सफल  होने  का तरीका  है। भला  हम  भगवान  को  खोजने  कहाँ  जा  सकते  हैं  अगर  उसे  अपने  ह्रदय  और  हर  एक  जीवित  प्राणी  में  नहीं  देख  सकते।
 जिस  क्षण  मैंने  यह  जान  लिया  कि  भगवान  हर एक  मानव  शरीर  रुपी  मंदिर  में  विराजमान  हैं ,    जिस  क्षण  मैं  हर  व्यक्ति  के  सामने  श्रद्धा  से  खड़ा  हो  गया  और  उसके  भीतर  भगवान  को  देखने  लगा – उसी  क्षण  मैं  बन्धनों  से  मुक्त   हूँ , हर  वो  चीज  जो  बांधती  है वह  नष्ट   हो  गयी , और मैं  स्वतंत्र  हूँ।  स्वतंत्र  होने  का  साहस  करो . जहाँ  तक  तुम्हारे  विचार  जाते  हैं  वहां  तक  जाने  का  साहस  करो , और  उन्हें  अपने  जीवन  में  उतारने  का  साहस  करो। किसी  दिन , जब  आपके  सामने  कोई   समस्या  ना  आये  – आप  सुनिश्चित  हो  सकते  हैं  कि  आप  गलत  मार्ग  पर  चल  रहे  हैं।  प्रेम  विस्तार  है , स्वार्थ  संकुचन  है।  इसलिए  प्रेम  जीवन  का  सिद्धांत  है।   वह  जो  प्रेम  करता  है  जीता  है और  वह  जो  स्वार्थी  है  मर  रहा  है।   इसलिए  प्रेम  के  लिए  प्रेम  करो , क्योंकि  जीने  का  यही  एक  मात्र  सिद्धांत  है , ठीक वैसे  ही  जैसे  कि  तुम  जीने  के  लिए  सांस  लेते  हो। भगवान  से  प्रेम  का  बंधन  वास्तव  में ऐसा है  जो  आत्मा  को  बांधता  नहीं  है  बल्कि  प्रभावी  ढंग  से  उसके  सारे  बंधन  तोड़  देता  है। 
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