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Tuesday, 24 May 2016

पुनर्जन्म


 पुनर्जन्म होता है - गीता : आदि श्री अरुण  

गीता 8 :6में श्री भगवान ने कहा  - हे  कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अंत काल में जिस - जिस भी भाव को स्मरण करता  हुआ शारीर का त्याग करता है, उस  - उस को ही प्राप्त  करता है क्योंकि वह सदा उसी  भाव से भावित रहता है। 





जो छोटा वस्त्र पहनता है , जो पश्चिमी  सभ्यता वाला  छोटा - छोटा  ड्रेस पहनता है ,  जो अर्धनग्न रहता है , जो अंग प्रदर्शन  करता  है, जो कैब्रे डान्सर है , उसका जन्म पेड़ में होता है, क्योंकि पेड़  कभी भी अपना तन नहीं ढ़कता । गीता 8 :6में श्री भगवान ने कहा  - हे  कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अंत काल में जिस - जिस भी भाव को स्मरण करता  हुआ शारीर का त्याग करता है, उस  - उस को ही प्राप्त  करता है क्योंकि वह सदा उसी  भाव से भावित  रहता है। 









जो भारतीय सभ्यता का ड्रेस  पहनता है और भारतीय सभ्यता को पसंद करता है उसका जन्म मनुष्य में होता है क्योंकि जब कोई सुहागिन अपने देह का त्याग करती है तो उससे पहले उसको पूर्ण रूप से सुहागन वाला ड्रेस पहनाया जाता है तथा सुहागन वाला श्रृंगार किया जाता है गीता 8 :6में श्री भगवान ने कहा  - हे  कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अंत काल में जिस - जिस भी भाव को स्मरण करता  हुआ शारीर का त्याग करता है, उस  - उस को ही प्राप्त  करता है क्योंकि वह सदा उसी  भाव से भावित  रहता है। 






जो ध्यान करते हुए अपने  शारीर का त्याग करता है वह ईश्वर को ही प्राप्त होता है।  उसका पुनर्जन्म  नहीं  होता है । गीता 8 :8 में श्री भगवान ने कहा  - यह नियम  है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रुप योग से युक्त , दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।  


जो क्रोध करता  वह उसी भाव से भवित  हुए शारीर का त्याग करता है तो उसका जन्म साँप में होता है। गीता 8 :6में श्री भगवान ने कहा  - हे  कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अंत काल में जिस - जिस भी भाव को 

स्मरण करता  हुआ शारीर का त्याग करता है, उस  - उस को ही प्राप्त  करता है क्योंकि वह सदा उसी  भाव से भावित  रहता है। 




पुनर्जन्म होता है: में श्री भगवन ने कहा  कि - मनुष्य जन्म - मृत्यु  चक्र  में भटकता रहता है।  गीता 2  :13  में श्री भगवान ने कहा  - जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शारीर की प्राप्ति  होती है। 


गीता 2  :22  में श्री भगवान ने कहा  - जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों  को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही जीवात्मा पुराने  शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। 










                                                                     
                                                                                                                                                       
एक मनुष्य ने इतने अन्य - अन्य शारीर  को प्राप्त किया  है,  यही तो  सृष्टि - चक्र है। 




अब आप विचार करें और तुरन्त निर्णय लें कि आपको किस योनि में जाना है और इसके लिए आपको क्या करना है ? फैसला आपके हाथ में है कि आप किसका चुनाव करते हैं ?




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