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गीता का उपदेश


आदि श्री अरुण : गीता का उपदेश भगवान और मनुष्य के बीच का आमना - सामना वार्तालाप है । इसमें ईश्वर और मनुष्य के बीच कोई मीडिएटर नहीं है । इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है।  गीता न सिर्फ जीवन का सही अर्थ समझाती है बल्कि परमात्मा के अनंत रुप से आपको रुबरु कराती है। इस संसारिक दुनिया में  दुख, क्रोध, अहंकार  ईर्ष्या आदि से पिड़ित आत्माओं को, गीता सत्य और आध्यात्म का मार्ग दिखाकर मोक्ष की प्राप्ति करवाती है। 
इस जगत में जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, नेत्रों से देखा जाता है, और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है, स्वप्न की तरह मन का विलास है।  इसलिए तुम  इस जगत में जो कुछ भी देखते हो वह केवल माया-मात्र है, मिथ्या है - ऐसा जान लो। 
गीता जीवन मृत्यु के दुर्लभ सत्य को अपने मे समेटे हुए है। कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इस संसार में  हर मनुष्य के जन्म का कोई न कोई उद्देशय होता है। मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है, यह तो एक अटल सत्य है जिसे टाला नहीं  जा सकता है । जो जन्म लेगा उसकी मृत्यु भी निश्चित है। जिस प्रकार हम पुराने वस्त्रों  को त्याग कर नए वस्त्रों  को धारण करते है, ठीक उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर के नष्ट होने पर नए शरीर को धारण करती है। जिस मनुष्य ने गीता के उपदेश  को अपने जीवन में  अपना लिया है उसे ईश्वर की कृपा पाने के लिए इधर उधर नही भटकना पड़ेगा। गीता आपको  जीवन के शत्रुओ से लड़ना सिखाती है, और ईश्वर से एक गहरा नाता जोड़ने मे भी मदद करती है। गीता त्याग, प्रेम और कर्तव्य का संदेश देती है। गीता में कर्म को बहुत महत्व दिया गया है। मोक्ष उसी मनुष्य को प्राप्त होता है जो अपने सारे सांसारिक कामों को करता हुआ ईश्वर की आराधना करता है। अहंकार, ईर्ष्या, लोभ आदि को त्याग कर मानवता को अपनाना ही गीता के उपदेशों का पालन करना है। 
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