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मुकेश के प्रश्न और आदि श्री का जबाब


मुकेश : आदि श्री के चरणों में प्रणाम स्वीकार हो। घर में मुझे सबसे लड़ाई होती है।  मेरा  दिमाग अशांत रहता है। रास्ते मिलने पर भी मैं उस रास्ते पर चल नहीं पता हूँ। हर पल मेरे मन में बेचैनी रहती है। मैंने अपने जीवन में कभी ख़ुशी देखा ही नहीं। आदि श्री जी, मुझे मार्गदर्शन कीजिये कि मैं क्या करूँ ?।  

आदि श्री अरुण : जब तुम्हारे वश का  कुछ भी नहीं है तो तुम सिर्फ एक काम करो  - केवल शुद्ध विचारों के साथ बोलो और  शुद्ध विचारों के साथ काम करो। यदि तुम ऐसा करोगे तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी तुम्हारा  साथ कभी नहीं छोड़ेगी। क्योंकि मनुष्य  आपने विचारों से ही अच्छी तरह ढलते हैं; मनुष्य  वही बनते हैं जो वे सोचते हैं। तुमको जो कुछ भी बनना है उसके लिये पहले तुमको उसकी कल्पना करने की जरुरत है।  तभी तुम्हारा  दिमाग तुमको जो  बनना है उस बनने वाले कार्य   में तुम्हारी सहायता करेगा। तुमको अपने दिमाग का शासक बनना होगा, किसी और को तुम अपने  दिमाग का चालक न बनने दो ।  मंजिल या लक्ष्य तक पहुँचने से ज्यादा महत्व रखता है यात्रा अच्छे से करना। तुम्हारा   दिमाग ही तुम्हारे  के  लिए सब कुछ है । जैसे तुम  सोचोंगे वैसे ही तुम  बनोगे।  जो कुछ भी गलत हो रहा है, दिमाग की वजह से ही हो रहा है । यदि दिमाग में गलत विचार आते हैं तो करने के लिए और बचा ही क्या है?  अगर कोई मुश्किल सुलझ सकती है तो क्यों चिंता करते हो ? अगर मुश्किल सुलझ नहीं सकती तो इसका मतलब तुम कुछ अच्छा नही कर रहे हो । यदि तुम  सही रास्ता  देख रहे हो तो तुमको जरुरत है  केवल उस रास्ते पर चलने की । निश्चित ही तुम बहुत  से अच्छी बातें अथवा धार्मिक शब्द  पढ़े होगे । तुम  निश्चित ही बहुत सी  अच्छी बातें  बोले भी होगे । लेकिन यदि तुम उनपर स्वयं चला  ही नहीं  करोगे तो कैसे तुम उन शब्दों को अच्छा कह सकते हो? मुश्किलें तब आती है, जब तुम  ये सोचने  लगते हो कि तुम्हारे  पास समय है। इसलिए तुम सोचो कि  तुम्हारे पास समय नहीं है और जो काम करना है तुरत कर डालो। 
यदि किसी का स्वभाव अच्छा है तो उसे किसी और गुण की क्या जरूरत है ? यदि आदमी के पास प्रसिद्धि है तो भला उसे और किसी श्रृंगार की क्या आवश्यकता है ?  इसलिए समय रहते तुम अच्छे स्वभाव के बनो और प्रसिद्ध प्राप्त करो। जो व्यक्ति परमेश्वर के आश्रय में रहता है उसकी यश और कीर्ति परमेश्वर स्वयं पुरे धरती पर  फैला  देते हैं। परमेश्वर प्रेम है और प्रेम ही जीवन है तथा परमेश्वर जीवन के स्रोत हैं। इसलिए  प्रेम  ही जीवन का  सिद्धांत  है।  वह  जो  प्रेम  करता  है  केवल वही जीता  है।  वह  जो  स्वार्थी  है  वह मर जाता  है।   इसलिए  प्रेम  करो और प्रेम से रहो  क्योंकि  जीने  का  यही  एक  मात्र  सिद्धांत  है।  जिस प्रकार   तुम  जीने  के  लिए  सांस  लेते  हो ठीक उसी प्रकार जीने के लिए प्रेम करो। इसके लिए तुम एक मात्र  परमेश्वर के ही शरण में जाओ। प्रेम  विस्तार  है और  स्वार्थ  संकुचन  है। तुम अपने लिए एथोराइज गुरु ढूंढ लो और उनके आदेश का पालन करो। तुम एक आध्यात्मिक जीवन जिओ। जिस प्रकार  मोमबत्ती बिना आग के नहीं जल सकती है ठीक उसी प्रकार  मनुष्य भी आध्यात्मिक जीवन के बिना नहीं जी सकता है । पिता, माता अग्नि, आत्मा और गुरु –  इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करो ।






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