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कर्म योग का परिचय - आदि श्री अरुण



मनुष्य किसी भी काल में कर्म किये बिना नहीं रह सकता है। क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृतिजनित गुणों के द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य यानि कि कम्पेल किया जाता है। लेकिन जिसके शास्त्रसम्म्त सम्पूर्ण कर्म  बिना कामना और संकल्प के होते हैं वह व्यक्ति ज्ञानों में भी अति ज्ञानवान और पण्डित है। जो व्यक्ति समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भली भाँति बरतता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता है। जिसने समस्त भोगों की सामग्री को त्याग दिया है वह पुरुष कर्म करता हुआ भी पापों को प्राप्त नहीं होता है।
मनुष्य के कल्याण के लिये तीन मार्ग बताये गए हैं - (१) कर्म योग (२) ज्ञान योग और (३ ) भक्ति योग  किन्तु कर्म योग के बिना न तो ज्ञान योग सिद्ध हो सकता है और न भक्ति योग ही सिद्ध हो सकता है। इसलिए कर्म योग को जानना बहुत ही जरूरी है।
कर्म योग उसको कहते हैं जिसमें आसक्ति नहीं हो। यदि कोई व्यक्ति किसी का उपकार करने के लिए कर्म करता है और उस व्यक्ति में उस समय अहंकार आजाता है तो वह उपकार कर्म योग केअंतर्गत नहीं आता  है। सच्चे कर्मयोग के लिए निष्काम होकर सेवा करनी  चाहिए। धर्म योग का अर्थ है कर्म के द्वारा परमेश्वर के साथ योग। जो भी कर्म अनासक्त होकर किया जाता है वह कर्म योग है।  यदि आनासक्त  होकर प्राणायाम, ध्यान या राजयोग  भी   किया जाय तो वह कर्म योग ही है। संसारी लोग यदि अनासक्त  होकर परमेश्वर की भक्ति करे और फल को परमेश्वर में अर्पण कर संसार में कर्म करे तो यह अवस्था भी कर्म योग ही है। कर्म के फल को परमेश्वर में अर्पण करते हुए पूजा, जप, तप करे तो वह भी कर्म योग ही है। ईश्वर लाभ ही कर्म योग का मुख्य उद्देश्य होता है।
गृहस्त आश्रम में रहने वालों को परमेश्वर के चरणों में सब कुछ अर्पण करके संसार के सभी कर्तव्य कर्मों का पालन करना चाहिए। यही कर्म योग है। परमेश्वर का ध्यान और  नाम जप करते हुए परमेश्वर  पर निर्भर रहकर जितना संभव हो सके अनासक्त भाव से कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।  यही कर्म योग का रहस्य है।
इस युग में अनासक्त हो कर कर्म करना बहुत ही कठिन है। लेकिन यदि कर्म मार्ग में भक्ति का उपयोग किया जाय तो अनासक्त कर्म संभव है। कोई भी व्यक्ति अपना कर्म नहीं छोड़ सकता क्योंकि  मानसिक क्रियाएँ भी तो कर्म ही है। मैं बिचार कर रहा हूँ, मैं ध्यान  कर रहा हूँ यह भी तो कर्म ही है।
भले ही अनासक्त कर्म कठिन हो  लेकिन प्रेम - भक्ति के द्वारा कर्म मार्ग सरल हो जाता है। परमेश्वर में प्रेम - भक्ति बढ़ने से कर्म कम हो जाता है और जो कर्म बचता है उसको अनासक्त होकर किया जा सकता है।  परमेश्वर की प्रेम - भक्ति में जब आप डूबे  रहते  हैं तब आप अनायास ही अनासक्त हो जाते हैं। उस समय आपके विषय - कर्म, धन, मान और यश आदि के  कर्म समाप्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को  धन, मान और यश आदि अच्छे नहीं लगते हैं।  जो व्यक्ति मिश्री का शरबत पीले क्या वह गुड़ का शरबत पीना चाहेगा ? 
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