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सत लोक की महिमा - ईश्वर पुत्र आदि श्री अरुण



जब कोई व्यक्ति सूरत - शब्द योग  का अभ्यास करता है और इसके द्वारा अनामी लोक के लिए प्रस्थान करता है तो रास्ते में अविनाशी लोक का पहला पड़ाव आता है जिसको सत लोक या सच्च खण्ड कहते हैं। अनामी लोक के यात्रा के दौरान आत्मा के  यात्रा का  यह बहुत ही महत्वपूर्ण  क्षेत्र व् पड़ाव  है जहाँ से सृष्टि उभरती है और यहाँ पर सम्पूर्ण  सृष्टि सिमटती है। अनामी के इस यात्रा में जब अकेला आत्मा (Individual Soul) इस स्थान पर पहुँचती है तब वह जन्म - मृत्यु के चक्र से छुटकारा पा जाती  है और वह आत्मा अमर हो जाता है। 
सत लोक या सच्च खण्ड सत्य का वह स्थान है जहाँ पर निर्गुण ईश्वर बैठते हैं । वह निर्गुण परमेश्वर  सारी सृष्टि को रचता है और इस रचना का आनन्द लेता है। यहाँ पर बहुत सारे क्षेत्र हैं, स्वर्गीय प्रणाली (Heavenly System) हैं और ब्रह्मांड हैं जो इस निर्गुण परमेश्वर के द्वारा रच गया है और जो उनकी इच्छा से स्थानांतरित होता है।  जिस किसी भी व्यक्ति को ऐसा दृश्य देखने को मिलता है अथवा उसे चिन्तन का आनंद प्राप्त होता है, वह व्यक्ति परमेश्वर के आशीष से आशीषित होता है।  
सत लोक या सच्च खण्ड के शाषक (Rular of Sat Lok or Sachch Khand) को सत पुरुष कहते हैं। सत पुरुष अनामी  पुरुष का अनुसरण करते हैं और सृष्टि को नियंत्रित करते हैं तथा निचले ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय प्रणालियों को विघटित अथवा नियंत्रित करते हैं। लेकिन इस परिवर्तन से सत लोक या सच्च खण्ड पर कोई असर नहीं पड़ता है। यहाँ पर साधक अनामी पुरुष से शक्ति प्राप्त करते हैं ।
सत लोक या सच्च खण्ड पिता के बैठने का स्थान है। सत पुरुष पिता का स्थान ग्रहण करने के कारण अनामी पुरुष की पूर्ण जानकारी रखता है। आत्मा सत पुरुष का प्रतिविम्ब  है जो कल्पों पहले निर्गत हुआ। 
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