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Monday, 1 February 2016

गुस्सा व क्रोध क्यों उत्पन्न होता है तथा क्रोद्ध व गुस्सा पर नियंत्रण क्यों और कैसे करें ?


क्या आपने सोचा है कि  आपके मन में  गुस्सा व क्रोध क्यों उत्पन्न होता है ? क्या आपने कभी सोचा है कि क्रोध व गुस्सा   आपके लिए हानिकारक है या लाभदायक ? यदि यह आपके लिए हानिकारक है तो  क्या आप जानते हैं कि  क्रोद्ध व गुस्सा पर नियंत्रण  कैसे करें ? ? ?



तमो गुण बढ़ने से अहंकार और अज्ञान उत्पन्न होता है तथा  सब प्रकार के भेद अहंकार से उत्पन्न होते हैं। भेद उत्पन्न होते ही लोग एक दूसरे से तुलना करने लगते हैं तथा दूसरे में कमी निकालने लगते हैं। कमी निकालनेवाले नजरिए की वजह से सभी में कमी निकालना एक स्वभाव सा बन जाता है। अज्ञानता के कारण ही   लोगों में सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता  है। ऐसी अवस्था  में व्यक्ति सच और झूठ में अंतर नहीं कर पाता है। ऐसे में व्यक्ति दूसरे पर दोषारोपण करने लगते हैं। दोषारोपण करने से क्रोध व गुस्सा उत्पन्न हो जाते हैं। 



क्रोध व   गुस्सा उत्पन्न होने से  मानसिक तनाव उत्पन्न हो जाता है।मानसिक तनाव उत्पन्न होने से मन की शांति ख़त्म हो जाती है और दोनों के बीच झगड़ा छिड़ जाता है। इस कारण लोगों का पतन हो जाता है। लोगों का पतन होने से कुछ भी बुरा होने का दोष भगवान पर मढ़ देता है। वह कहता है कि मैंने भगवान का इतना पूजा-पाठ किया और बदले में उन्होंने मुझे ये परेशानियां दीं। लेकिन इसके विपड़ीत जब कुछ अच्छा होता है, तब वह खुद को ही शाबाशी देता है।इसलिए यदि आप इस पड़ेशानी में घिर गए हैं तो तमो गुण को नष्ट करने के लिए प्रयास करना चाहिए। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चाहिए कि वह सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश  में करके समाहितचित्त  हुआ परमेश्वर के परायण हो कर ध्यान में बैठे। क्योंकि जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में होती है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।  (गीता २:६१) मनुष्य की  बुद्धि स्थिर होजाने से  एकदम सही और एकदम गलत में फर्क समझ में आने लगता है। सही और गलत में फर्क समझ में आजाने से क्रोध व गुस्सा नष्ट हो जाता है। क्रोध व गुस्सा के नष्ट होते ही  सबके लिए प्रेम उपजने लगता है। इसलिए  तू पहले सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश  में करके इस ज्ञान और विज्ञान का  नाश   करने वाले   महान पापी  क्रोध व   गुस्सा को बल पूर्वक  मार  डाल ।  गीता ३ :४२ में परमेश्वर ने कहा कि स्थूल शरीर से बलवान इन्द्रियाँ है;  इन्द्रियों से बलवान मन है; मन से बलवान बुद्धि है और बुद्धि से बलवान आत्मा है। 
इसलिए बुद्धि से सूक्ष्म, बलवान और श्रेष्ट आत्मा को जान कर ध्यान कर तथा बुद्धि के द्वारा मन को वश  में करके  क्रोध व गुस्सा रूप दुर्जय शत्रु को मार डाल। 
आप न तो विवेकहीन बनें और न ईश्वर पुत्र में श्रद्धा को खोएँ और न संशययुक्त बनें  क्योंकि  गीता ४:४० में परमेश्वर ने कहा  कि विवेकहीन और श्रद्धारहित मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है। 
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