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Sunday, 24 January 2016

शांति कैसे मिलेगी ?


 शांति कब प्राप्त होगी ? जब आपकी पड़ेशानी मिटा दी जाएगी, जब आपके दुखों को मिटा दी जाएगी, जब आपको विमारयों से मुक्त कर दिया जाएगा, जब आपके आँशू पोछ दिए जाएँगे। ऐसा कब होगा ?  जब आप परमेश्वर के शरण में जायेंगे। क्योंकि  परमेश्वर में सामर्थ्य  है कि वे आपको दुखों से बहार निकाल देंगे ।   परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपको  पड़ेशानी से बाहर निकल देंगे। परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपको  विमारयों से मुक्त कर देंगे।परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपके सभी आँशुओं को पोछ  देंगे। केवल जरूरत है आपको परमेश्वर के शरण में जाने की। आप परमेश्वर के  राज्य की खोज करें क्योंकि परमेश्वर का राज्य खाना - पीना नहीं बल्कि धर्म, मिलाप और आनंद है जो पवित्र आत्मा से होता है। (धर्मशास्त्र, रोमियों १४:१७ )जब तक हम देह में रहते हैं तब तक परमेश्वर से अलग हैं क्योंकि हम रूप को देख कर नहीं बल्कि विश्वास से चलते हैं। (धर्मशास्त्र, २ कुरिन्थियों ५:६-७) इसलिए हम धीरज रखें और देह से अलग होकर परमेश्वर के साथ रहना उत्तम समझें क्योंकि परमेश्वर से अलग रहकर आप कुछ नहीं कर सकते। परमेश्वर दाखलता हैं और तुम डालियाँ हो। जो परमेश्वर में बना रहेगा  और परमेश्वर तुम में तो तुम बहुत फल लाओगे। यदि कोई परमेश्वर में बना न रहे  तो वह डाली की तरह फेक दिया जायेगा।  तब क्या होगा ? वह डाली की तरह सुख जायेगा और लोग उन्हें बटोर कर आग में जला देंगे।  
परमेश्वर ने  हम सबों  की रचना अपनी इच्छा से  किये हैं। जो परमेश्वर की दृष्टि  में अच्छा है उसको वह बुद्धि, ज्ञान और आनन्द देता है। (धर्मशास्त्र, सभोपदेशक २ :२ ६) परमेश्वर ने कहा कि जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शांति देती है वैसे ही  तुम्हें शांति दूंगा। इस लिए जरूरत है परमेश्वर की दृष्ट में अच्छा बनने की।  परमेश्वर की दृष्ट में आप अच्छा देसी बनेंगे ? इसके  लिए आप ६ उपाय कीजिये जो निम्न प्रकार वर्णित हैं :-
(१) आप परमेश्वर का आज्ञाकारी बनिए 
(२)  आप परमेश्वर का विश्वासयोग्य  बनिए
(३) आपस में प्रेम रखें,  आपस में मिल्लत बनाए रखें , सब एक मन के हों, सब केवल एक ही ईश्वर को मानने वाला  बनिए 
(४) जिस प्रकार परमेश्वर ने आपसे प्यार किया कि  आप परमेश्वर का संतान कहलाए ठीक उसी प्रकार आप भी एक दूसरे से प्यार करें
(५) आपस में फूट न हो, आपस में विरोध न हों, मूर्ति पूजा न करें, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध न करें और आपस में मेल - मिलाप से रहिए 
(६) हर एक बात में तुम्हारा निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सामने उपस्थित किये जाएँ ।  
यदि आप ऐसा करेंगे तब परमेश्वर की शान्ति जो आपके समझ से बिलकुल परे  है, हर हमेशा सुरक्षित रहेगी।             
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