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मानो या न मानो !

हे पृथ्वी पर रहने वाले लोगों ! जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करता है उसको ही परमेश्वर अपना मान बैठते हैं। और परमेश्वर जिस व्यक्ति को अपना मान बैठते हैं वे केवल उसी  व्यक्ति को ही अपना रूप दिखाते हैं। परमेश्वर आप लोगों के आगे केवल अपना नाम प्रकट किये हैं परन्तु अपना रूप प्रकट नहीं किए हैं। वे तो आप लोगों से अपना रूप छिपा लिए हैं। जब आप परमेश्वर की उपासना अनन्य भक्ति और अनन्य प्रेम के साथ करेंगे तो परमेश्वर आपको अपने रूप का दर्शन कराएँगे। क्योंकि अनन्य प्रेम - भक्ति वाले ज्ञानी पुरुष को परमेश्वर अत्यंत प्रिय है और परमेश्वर के लिए वह अनन्य प्रेम - भक्ति वाले ज्ञानी पुरुष अत्यंत प्रिय है।
                 गीता ८:१४ में परमेश्वर ने कहा कि "जो पुरुष अनन्यचित्त हो कर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है उसके लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात उसको मैं सहज ही ( आसानी से ) प्राप्त हो जाता हूँ। "                         गीता ११ :५४ में परमेश्वर ने कहा कि "मैं अनन्य भक्ति के द्वारा प्रत्यक्ष दर्शन के लिए संभव हूँ। " तब प्रश्न यह उठता है कि अनन्य भक्ति कहते हैं किसको ?
              जो पुरुष केवल परमेश्वर के लिए ही सम्पूर्ण कर्तव्य - कर्मों को करने वाला है, जो पुरुष केवल परमेश्वर के ही परायण है अर्थात केवल परमेश्वर के ही आश्रय में रहने वाला है, जो पुरुष आसक्ति से रहित है और जो सम्पूर्ण भूत प्राणियों में वैर भाव से रहित है ; वह पुरुष अनन्य भक्ति से युक्त है और अनन्य भक्ति से युक्त पुरुष परमेश्वर को ही प्राप्त होता है। (गीता ११:५५)
             प्रेम के फल के संबंध में परमेश्वर ने कहा कि "जो कोई भक्त प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र - पुष्प आदि मैं सगुन रूप से प्रकट हो कर प्रीति सहित खता हूँ। " (गीता ९ :२९ ) तब तो अनन्य प्रेम और अनन्य भक्ति रखने वाले लोग परमेश्वर के रूप का दर्शन कर ही लेंगे।
              परमेश्वर तुम्हारा पिता है और एक पिता का दिल कैसा होता है क्या आप जानते हैं ? पिता चाहते हैं कि मेरा बेटा, मेरी बेटी जब नदियों से होकर चले तब उसे नदियों का जल डूबा न सके, जब आग से होकर चले तब उसकी लौ उसे जला न सके।  उसकी दृष्टि में तू अनमोल है। आपके बीच रहने की उनकी चाहत है, आपके बीच चलने - फिरने की उनकी चाहत है।  परमेश्वर ने वचन दिया कि वे आपका पिता होंगे और आप उनके बेटे एवं बेटियाँ होंगे। उन्होंने कहा कि तू डर मत, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ, मैं तेरे वंश को पूरब से ले आऊँगा, और पशिम से भी इकठ्ठा करूँगा। मैं उत्तर  कहूँगा - दे  दो और दक्षिण से कहूँगा कि रोक मत रख। मेरे पुत्रों को दूर से और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी की छोर से ले आओ। हर एक जो मेरा कहलाता है उसको मैं  अपनी महिमा के लिए सृजा हूँ। मुझसे पहले कोई ईश्वर न हुआ और न मेरे बाद कोई ईश्वर होगा। मैं  ही ईश्वर हूँ  और भविष्य में भी मैं ही होउँगा। मेरे हाथ से कोई छुरा न सकेगा, जब मैं काम करना चाहुँ तो कौन मुझे रोक सकेगा ? (धर्मशास्त्र, यशायाह ४३ :१३ ) उन्होंने कह कि पुकारने से पहले मैं उत्तर दूंगा और तुम्हारे मांगते ही मैं तुम्हारी सुन लूंगा।(धर्मशास्त्र, यशायाह ६५ :२४) उन्होंने आगे यह भी कहा कि - यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पिउवे बच्चे को भूल जाये और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे परन्तु मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता। (धर्मशास्त्र, यशायाह ४९:१५)
                आपको दुःख से बहार निकाल देने का सामर्थ्य परमेश्वर में है,  आपको आर्थिक पड़ेशानी  से बहार निकाल देने का सामर्थ्य परमेश्वर में है, आपको विमारियां से कर देने का सामर्थ्य परमेश्वर में है परन्तु जरुरत है परमेश्वर के इच्छा के अनुकूल आपको चलने की,  जरुरत है परमेश्वर के आज्ञा को मैंने की और जरुरत है परमेश्वर का विश्वास योग्य बनने की। यदि तुम मेरे बताये गए मार्ग पर चलोगे तो तुम्हारा दुःख आनंद में बदल जायेगा। जिसका मन परमेश्वर में धीरज धरे हुए है उसकी परमेश्वर पूर्ण शांति के साथ रक्षा करेंगे। आपसे मैं सच कहता हूँ कि तेरे लिए हर तराई भर दी जाएगी, हर एक पहाड़ और पहाड़ी गिरा दी जाएगी।  जो टेढ़ा है वह सीधा और जो ऊँचा - निचा है वह चौरस किया जायेगा।  आपके प्रत्येक दुःख को मिटा कर सुख की बरसात की जाएगी। आकाश की झरोखे खोल कर अपरम्पार आशीष का बरसात किया जायेगा।
              
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