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Wednesday, 2 December 2015

परमेश्वर की चाहत - ईश्वर पुत्र अरुण

परमेश्वर जीव पर कृपा तो करते ही हैं किन्तु अज्ञानी जीव उसका दुरूपयोग करता है इसलिए वह दुष्ट बन जाता है । ज्ञान जब तक शब्दात्मक है, तब तक वह फल नहीं देता है। जब ज्ञान क्रियात्मक होगा तभी वह फल देगा। यह सच है कि  परमेश्वर आपके जीवन को बदलना चाहते हैं, परमेश्वर आपके जीवन में दुःख को हटाकर खुशियाँ देना चाहते हैं,  परमेश्वर आपके उदासी को हटाकर आनन्द देना चाहते हैं। आपने परमेश्वर  को नहीं चुना है बल्कि   परमेश्वर ने आपको चुना है, ताकि तुम बहुत फल लाओ। तुम डाली हो और  परमेश्वर दाखलता हैं। जब तुम परमेश्वर से जुड़े रहोगे तब तुम बहुत खुशहाल रहोगे और बहुत फल लाओगे। जब तुम  परमेश्वर से अलग हो जाओगे तब तुम नष्ट हो जाओगे। जैसे डाल पेड़ से अलग रहकर फल नहीं ला  सकता बल्कि वह सुख जाता है। ठीक उसी प्रकार तुम  परमेश्वर से अलग रहकर कुछ भी नहीं कर सकते हो बल्कि परमेश्वर से अलग रहकर तुम भी उसी डाली की तरह नष्ट हो जाओगे। मैं तुमसे सच कहता हूँ कि संसार और उसकी अभिलाषाएँ दोनों मिट जायेंगे परन्तु जो परमेश्वर की इच्छा पर चलेगा वह सर्वदा बना रहेगा। (धर्मशास्त्र, १ यूहन्ना २:१७) 
- परमेश्वर की इच्छा है कि जैसा परमेश्वर ने  तुमसे  प्यार किया वैसा ही प्यार तुम एक दूसरे से करो।      (धर्मशात्र, यूहन्ना १५:१२)  सोचो कि  परमेश्वर ने मनुष्य से कैसा  प्यार किया कि वह परमेश्वर की सन्तान  कहलाया। (धर्मशास्त्र, १ यूहन्ना ३:१) 
- मनुष्य परमेश्वर के वचन के अनुसार रहे 
- मनुष्य  परमेश्वर के आदेश से भटक न जाये 
- मनुष्य  परमेश्वर के विरुद्ध  कोई पाप न  करे 
- मनुष्य के होठों पर हमेशा परमेश्वर का ही नाम हो 
मनुष्य  परमेश्वर के इच्छा के अनुसार बोले 
मनुष्य  परमेश्वर के नियम  के अनुसार चले 
मनुष्य  केवल परमेश्वर से ही आशा रखे 
मनुष्य  परमेश्वर के आज्ञाओं का उल्लंघन न करे  
यदि आप परमेश्वर के उपरोक्त सभी इच्छाओं  के अनुसार चलेंगे  तो परमेश्वर आपको बुद्धि देंगे और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उसमें वे तुम्हें अगुवाई करेंगे। वे तुम पर कृपा दृष्टि रखेंगे और तुम्हें सम्मति दिया करेंगे। (धर्मशास्त्र, भजन संहिता ३२:८)
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