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Sunday, 18 October 2015

क्या आप परमेश्वर की अनुभूति प्राप्त करना चाहते हैं ?

प्रेम एक निर्मल झरना है । उसके प्रवाह में जो भी आ जाता है, वह निर्मल हो जाता है । जिस प्रकार पात्र और कुपात्र की घृणा जैसे झरने के स्वच्छ प्रवाह में नहीं होती है ठीक वैसे ही प्रेमी के अन्त़करण में किसी प्रकार की ईर्ष्या - द्वेष या घृणा की भावनायें नहीं होती । महात्मा गाँधी जी अपने आश्रम में अपने हाथों से एक कोढ़ी की सेवा-सुश्रुषा किया करते थे । इसमें उन्हें कभी भी घृणा पैदा नहीं होती थी । प्रेम की विशालता में ऊपर से जान पड़ने वाली मलीनतायें भी वैसे ही समा जाती हैं जैसे हमारी नदियों का कूड़ा कबाड़ समुद्र के गर्भ में विलीन हो जाता है । प्रेम आत्मा के प्रकाश से किया जाता है । आत्मा यदि मलीनताओं से ग्रसित है तो भी उसकी नैसर्गिक निर्मलता में अन्तर नहीं आता । यही समझकर उदारमनसे  व्यक्ति अपनी सहानुभूति से किसी को भी वंचित नहीं करते ।
सच कहें तो मानव जीवन का आज तक जो भी विकास हुआ है वह सब प्रेम का संबल प्रकाश पाकर हुआ है । घृणा और ईर्ष्या-द्वेष के कारण लोगों के दिल-दिमाग बेचैन उदास हो जाता है और मन खिन्न हो जाते हैं । निर्माण कर्त्ता प्रेम है जिससे विशुद्ध कर्त्तव्य भावना का उदय होता है । हम यदि इस भाव को अपने जीवन में धारण कर पायें तो अमीरी हो या गरीबी, शहर में रहते हों या गाँव में, मकान पक्का हो अथवा कच्चा, आप  एक ऐसा जीवन जी सकते हैं, जिसे सुखी जीवन कह सकते हैं ।

प्रेम भेद - भाव को दूर करता है, प्रेम दो व्यक्ति व दो समुदाय के बीच की दूरियाँ को ख़त्म करता है, प्रेम में लोग बड़ा से बड़ा त्याग करता है, प्रेम मानसिक तनाव को खत्म करता है, प्रेम डर  को खत्म करता है, प्रेम डिप्रेशन को ख़त्म करता है, प्रेम में देने का भाव होता है लेने का नहीं, प्रेम में बदले की भावना खत्म होजाती है, प्रेम में विश्वास बढ़ता है, प्रेम में प्रमाण देने  की आवश्यकता नहीं होती, प्रेम में  ऊँच - नीच, आमिर - गरीब, जाति  - धर्म  का भेद - भाव मिट जाता  है , प्रेम में अवर्णननीय सुख की अनुभूति होती है, अनन्त सुख की अनुभूति होती है, अनन्त आनंद का अनुभव होता  है । गीता ६:२८ कहती है कि निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाने से अनन्त आनंद का अनुभव होता  है । गीता  में परमेश्वर कहते हैं  कि  परमात्मा की उपासना से बड़े सुख मिलते हैं । यह सुख प्रेम का ही प्रसाद है । प्रेम की पूजा ही परमात्मा की पूजा है । फिर हम भी सबसे  प्रेम करने वाला व्यक्ति ही क्यों न बनें ? 
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