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Saturday, 17 October 2015

ईश्वर पुत्र के मुख से प्रवाहित वचन

जो मनुष्य परमेश्वर की  इच्छाओं के अनुसार चलता है वह हमेशा ही  जीवित रहता है। इस बात को लोग सुनते तो हैं परन्तु अपने  दैनिक जीवन में इसको उतारते नहीं हैं। इसलिए इस अमृत तुल्य बातों को सुनने के बाद भी लोगों को कोई लाभ नहीं मिलता है। आप देखते होंगे कि बहुत सारे परिवार हैं जो  बर्वाद हो गए क्योंकि वे  परमेश्वर की  इच्छाओं के अनुसार नहीं चले और अपने घर को सांसारिक नीव पर खड़ा  किये थे। थोड़ा सा प्रेसर पड़ा और वह गिरकर धरासाई हो गया। लेकिन जो व्यक्ति अपना घर परमेश्वर के नाम रूपी चट्टान पर बनाते हैं, उनका घर हमेशा स्थिर और सुरक्षित रहता  है क्योंकि परमेश्वर सारी विपत्तिओं से आपकी रक्षा करते हैं । मैं आपको अमेरिका के एक परिवार की हकीकत वयान करता हूँ। एक आदमी बड़ा ही धर्मी और परमेश्वर का विश्वास योग्य था। उसको केवल एक ही बेटा और एक ही बेटी था। वह अपने बेटा और बेटी दोनों को बड़े लाड - प्यार से पाला और उन दोनों को परमेश्वर की पूजा - भक्ति में लगाया। उन दोनों को ही उसने परमेश्वर के सामर्थ्य के बारे में बताया।  लेकिन जैसे - जैसे वह बड़ा हुआ वैसे - वैसे वह परमेश्वर से अलग होता चला  गया। बेटा  बाप को खड़ा - खोटा सुनाने लगा और वह परमेश्वर की पूजा करना बन्द कर दिया। बेटी भी  भाई के ही रास्ते पर चलने लगी। भाई - बहन दोनों को काफी अच्छी नौकरी मिल गई लेकिन  परन्तु उसके जीवन का आधार परमेश्वर की  इच्छाओं के विपड़ीत था। बेटी बहुत ही अच्छे Post पर काम करती थी। उसका Working Place अमेरिका का वह दो  World Trade Center Tower था जिस पर अमेरिका  को नाज था। वह कभी भी परमेश्वर को  को याद नहीं करती थी। उसके पिता जी ने उसे अनेकों बार पूजा के  लिए Force किया, अनेकों   बार परमेश्वर का  नाम जप  करने के लिए प्रेसर डाला लेकिन वह अपने पिता की बात नहीं मानी। Force करने पर उसकी बेटी अपने पिता जी को जबाब दी - मुझे परमेश्वर की जरूरत नहीं। वह इतने बड़े Post पर कार्यरत्त थी कि उसको अपने जीवन में परमेश्वर की जरूरत मह्शूश ही नहीं  हुई। उसकी जरूरत की प्रत्येक चीजें उसे पूरी हो जाती थी इसलिए वह परमेश्वर का नाम लेना जरूरी नहीं समझती थी । उसकी मंगनी हो चुकी थी। एक दिन 11 September 2001 को टेरेरिष्ट एटैक में वह टावर ध्वस्त हो गया जिसमें वह काम करती थी। वह भागने की कोशिशें की परन्तु बहार निकल न सकी। वह दीवार से टकराकर गिर गई।  वह रोती  रही, चिल्लाती रही - कोई है ? कोई है ? कोई है ? … मुझे बचाओ, लेकिन उसको बचाने उसके पास कोई नहीं आया। जहाँ पर वह helpless पड़ी थी वहाँ पर के दीवार में एक  बड़ा सुराख़ था। वह उस सुराख़ से रोशनी को आते देखी। वह यह भी देखी कि बचाव दल के लोग ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर भाग रहे हैं। वह फिर चिल्लाई - मुझे बचाओ … मुझे बचाओ। परन्तु बचाव दल का कोई भी आदमी उसको बचाने नहीं आया। वह मलबे के अंदर दबी दर्द से बिलख रही थी। तभी तुरन्त उसको अपने पिता की बातें याद आई - "परमेश्वर हमारा शरण स्थान और बल है। संकट में वह अति सहज से मिलने वाला सहायक है। इस कारण हमको कोई भय नहीं चाहे पृथ्वी उलट जाए, और पहाड़ समुद्र के बीच में डाल दिए जाएँ। "(धर्मशास्त्र, भजन संहिता ४६:१-२) वह कराहते हुए परमेश्वर को याद की और बोली - " हे परमेश्वर ! मैं अपने पिता जी को  कहते सुनी हूँ - विपत्ति के दिन परमेश्वर उसको बचाएगा। परमेश्वर उसकी रक्षा करके जीवित रखेगा। " (धर्मशास्त्र, भजन संहिता ४१ :१-२)  हे परमेश्वर ! मैं मरना  नहीं चाहती। दर्द से मैं अत्यन्त व्याकुल हो रही हूँ। मुझको तेरी सहायता की आवश्यकता है। तू जल्दी कर। जैसे ही वह ऐसा बोली वैसे ही उसके पास एक आदमी आया और उसके पैर को स्पर्श किया। पैर को स्पर्श करते ही उसको बड़ा आराम मिला। वह पूछी - आप कौन हैं और आपका क्या नाम है ? उसने जबाव दिया - मेरा नाम अरुण है और मैं दिव्य सेवा दल का आदमी हूँ। इसके तुरत बाद वहाँ पर सेवा दल का आदमी पहुँचा।  वह उसे मलवे से बाहर निकला और उसको स्ट्रेचर  पर लिटा कर  हॉस्पिटल ले गया। कुछ दिनों के बाद वह एकदम ठीक हो गई। जब वह डिस्चार्ज की जा रही थी तब सेवा दल का सभी आदमी उस लड़की से  मिलने के लिए उसके पास आया। वह लड़की सेवा दल के सभी आदमियों से पूछी - वो कहाँ है ? सेवा दल का आदमी ने पूछा - कौन ? लड़की ने जबाव दी - अरुण। सेवा दल का आदमी ने जबाव दिया - सेवा दल  में अरुण  नाम का कोई भी व्यक्ति नहीं है। तब उसको स्मरण हुआ - वह तो स्वयं परमेश्वर था जिसने अरुण नाम से मेरे पास आया और मेरे पैड़ को  स्पर्श किया। उसके स्पर्श करने मात्र से मेरे दर्द गायब हो गये। उसने बताया था - दिव्य सेवा दल का मैं आदमी हूँ। मैं ही  समझ  न सकी। क्या आप जानते हैं कि उस लड़की का नाम क्या था ? उस लड़की का नाम था  लीसा। 
हे भ्रम में पड़े लोगों ! प्रत्येक युग में सृजनात्मक शब्द से मानव जाति  को परमेश्वर की कृपा प्राप्त हुए हैं। मैंने सुना है कि  आपके जीवन में सैतान ने काफी उपद्रव मचाया है। वह आपके घर में अनगिनत कष्ट लाया है तथा आपको बहुत नुक्सान पहुँचाया है। इसलिए परमेश्वर ने आज प्रतिज्ञा किया है कि - आपने जितना खोया है परमेश्वर आपको उसका दुगुना देंगे। 

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