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Tuesday, 8 September 2015

भगवान के दर्शन किस प्रकार होंगे ?

अनन्य भक्ति के द्वारा भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन आप कर   सकते हैं। (गीता ११:५४) लेकिन अनन्य भक्ति में प्रेम की  मौजूदगी भी आवश्यक है। क्योंकि बिना प्रेम का भक्ति सिद्ध नहीं होती। भगवान को जो प्रेम से पुकारता है, उसके समक्ष वे अवश्य ही प्रकट होते हैं। भगवान का  दर्शन प्राप्त करने के लिए ६  चीजों  को अपनाना अनिवार्य है  :
(१) भगवान के  लिए अनन्य प्रेम हो
(२) भगवान के  लिए अनन्य भक्ति हो
(३) अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर भगवान को स्मरण करें
(४) भगवान के स्वरुप का मनन करें
(५) निष्काम भाव से भगवान की पूजा  करें तथा सम्पूर्ण कामनाओं  का पूर्ण रूप से त्याग कर  दें 
(६) ब्रह्म मुहूर्त में ४ बजे से ५:३० बजे के बीच नाम जप तथा ध्यान करें 
लोगों के मन में विकृति आचुकी है। लोगों के जीवन और आराधना में लापरवाही और विकृति आ गई है इसलिए उन्हें भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं  होते। मन में आई विकृति को ठीक करने के लिए पहले अनुलोम -  विलोम प्राणायाम करें  इसके बाद  जप और ध्यान एक  साथ करें। यह निश्चित है कि जो मनुष्य ईश्वर में अनन्यचित्त होकर सदा ही निरन्तर ईश्वर को स्मरण करता है, उस नित्य निरन्तर ईश्वर में युक्त हुए मनुष्य को ईश्वर सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। ईश्वर को पुकारने में प्रेम की प्रधानता है तथा उन्हें अनन्यचित्त होकर निरन्तर स्मरण करने की जरूरत है। ईश्वर जीव को गोद  में  बैठाने के लिए तैयार हैं परन्तु जीव ही ईश्वर के पास नहीं जाता है। मनुष्य ने ईश्वर को देखा कि  वे एक हाथ ऊपर उठाये हुए हैं।  उनके प्रेमी भक्तों ने उनसे पूछा कि आपने एक हाथ इस तरह उपर  क्यों  उठा  रखा है ? तो परमेश्वर ने उन्हें जबाव दिया कि मेरे सभी बालक मुझे भूल गए हैं। मैं एक हाथ उपर उठा कर रोज उन्हें बुलाता हूँ किन्तु वे मेरे पास आते ही नहीं हैं।
किसी के प्रति द्वेष  रख कर ईश्वर की आराधना नहीं की जा सकती और ऐसी आराधना सफल भी नहीं हो सकती। अपने पूर्व जन्म के प्राप्त फल के कारण ही लोगों को अपमान सहना पड़ता है और उनको अनेकों दुःख, पडेशानी तथा कष्ट भोगने पड़ते हैं।  जो अनन्य प्रेमी भक्तजन ईश्वर का निरन्तर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य - निरन्तर ईश्वर का चिंतन करने वाले मनुष्यों को योग और क्षेम ईश्वर  स्वयं प्राप्त कर देते हैं। योग का अर्थ होता है अप्राप्त बस्तु और क्षेम का अर्थ होता है सुरक्षा प्रदान करना। अर्थात जो बस्तु अप्राप्त है ईश्वर उसे भी मनुष्य को दे देते हैं और साथ में उसका रखवाली भी करते हैं ताकि कहीं कोई छीन न ले। ऐसे शुभ परिस्थिति प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित ७ चीजों को अपनाने की आवश्यकता है :
(१)अपने विकृत मन को सुधरने के लिए श्रृंगार करना। श्रृंगार किस प्रकार किया जाता  है ? क्या आप  जानते हैं ?  अनुलोम - विलोम प्राणायाम करने से विकृत मन सुधरता है और   श्रृंगार सम्पन्न होता है।
(२) मानसी सेवा करना।   मानसी सेवा सबसे श्रेष्ट माना  गया है। ध्यान करने से पहले मानसी सेवा करना जरूरी है। उस समय मन की धारा कहीं टूट न  जाये इसका ख्याल रखना आवश्यक है । ईश्वर के  स्वरुप में मन हमेशा संलग्न रहना चाहिए ।
(३)मानसी सेवा  लिए उत्तम समय है प्रातः काल के चार बजे से साढ़े पाँच बजे तक का ।   
(४) भगवान के स्वरुप का मनन करते हुए ध्यान करना जरूरी है ।
(५)जप ध्यान सहित होना चाहिए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जप करते समय भी संसार का ही चिंतन करते रहते हैं। ऐसा करने के कारण जप तो  निष्फल नहीं माना  जा सकता किन्तु जैसा फल मिलना चाहिए वैसा फल नहीं मिल पाता   है।
(६) जप और ध्यान एक साथ होनी चाहिए। जप करते समय जिस देव का तुम ध्यान कर रहे हो, उसकी मूर्ति तुम्हारे मन से नहीं हटनी चाहिए। जीभ से भगवान का नाम लिया जाये और मन से भगवन का स्मरण किया जाये। आँखों से उनका दर्शन करो और कानों से उनका श्रवण करो।
(७)उपरोक्त वर्णित सभी चीजों में  प्रेम की प्रधानता होनी चाहिए। अर्थात प्रत्येक एक्टिविटी में  प्रेम, श्रद्धा एवं पूर्ण विश्वास होना चाहिए।
जो कोई भक्त उपरोक्त वर्णित साधन से युक्त होकर ईश्वर के लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, तो उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र - पुष्प आदि ईश्वर सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाते हैं।          

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