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आज परमेश्वर ने आपको क्या आज्ञा दी है ?


परमेश्वर की इच्छा थी कि मनुष्य हमारी आज्ञा को माने इसलिए उन्होंने धर्मशास्त्र में यह लिखवाया  कि यदि तुम मेरे वचन को मानो तब मैं तेरा परमेश्वर होऊंगा, जिस मार्ग पर चलने की मैं  तुम्हें आज्ञा दूँ उसी मार्ग पर चलो तब तुम्हारा  भला होगा।इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सारी सृष्टि को रचने के बाद अपने स्वरूप के अनुसार मनुष्य को नर और नारी करके रचा और उनको आशीष दिया।   मनुष्य परमेश्वर से संपर्क बनाये रखे इसके लिए उन्होंने मनुष्य के लिए कुछ नियम बनाये। उनकी इच्छा थी कि नर और नारी दोनों हमारा कहना माने ताकि हमसे बराबर संपर्क बनी रहे और उनको आशीष मिलता रहे ।
परमेश्वर ने अपनी सृष्टि में सबसे प्रिय आदम और हव्वा को बनाया लेकिन इन दोनों ने परमेश्वर का कहना नहीं माना।  इन दोनों ने ईश्वर के नियम को नहीं माना। इसलिए उसका पतन होगया और परमेश्वर ने उसको अदन वाटिका से हटा कर धरती पर मरने - जीने वाले शरीर में  उतार दिया और उन दोनों से कहा कि अब तुमको मिहनत की रोटी मिलेगी तथा सुख - दुःख और जन्म - मृत्यु के वादियों से गुजरना पड़ेगा। धरती पर उनका वंश बढ़ता गया। लोगों ने अपना - अपना चाल चलन बिगाड़ लिया। इसलिए  परमेश्वर ने पृथ्वी पर जल प्रलय भेज कर सबको नष्ट कर देने का निर्णय लिया।  मनुष्यों में से एक व्यक्ति था नूह। वह बहुत ही धर्मी और खड़ा पुरुष था। वह परमेश्वर के साथ - साथ चलता रहा। इसलिए परमेश्वर ने नूह को, नूह के पत्नी को, नूह के बेटों एवं बहुअों को नाव पर चढ़ा कर बचा लिया और शेष को जल में डूबा कर नष्ट कर दिया।   
जल प्रलय उपस्थित होने से पहले परमेश्वर ने नूह से कहा कि तू अपने सारे घराने समेत जहाज में जा क्योंकि मैंने इस समय के लोगों में से केवल तुम्हीं को अपनी दृष्टि में धर्मी देखा है । जल प्रलय ख़त्म होने के बाद फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष देते हुए कहा कि "फूलो - फलो और बढ़ो और पृथ्वी में भर जाओ। " सृष्टि रचने के बाद मनुष्य से भोजन के विषय में कहा था कि - "सुनो, जितने बीज वाले छोटे - छोटे पेड़ सारी पृथ्वी  के उपर  हैं  और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं वे सब मैंने तुमको भोजन के लिए दिया हूँ।(धर्मशास्त्र, उत्पत्ति १:२९)  इसलिए उस समय लोग शाकाहारी बन गए। " लेकिन जल प्रलय में सारे पेड़ - पौधे जल में डूब कर नष्ट हो गए। इसलिए छोटे - छोटे पेड़ और फल अब धरती पर मिलना संभव नहीं था। मनुष्य क्या भोजन करता मनुष्य के सामने यह बहुत बड़ी समस्या आकर खड़ी हो गई थी।  ऐसी विकट परिस्थिति में परमेश्वर ने भोजन समस्या को सुलझाते हुए कहा कि "अब से सब चलने वाले जन्तु  तुम्हारा आहार होंगे। भोजन के लिए जैसे मैं तुमको हरे - हरे छोटे पेड़ दिया था ठीक वैसे ही अब भोजन के लिए तुझको मैं सब कुछ देता हूँ पर मांस को प्राण समेत न खाना । (धर्मशास्त्र, उत्पत्ति ९:३-४) तब से मनुष्य मंसाहारी और शाकाहारी दोनों होगया और मांसाहारी भोजन करने के लिए परमेश्वर ने ही आज्ञा दिया। "    
परमेश्वर ने आज मनुष्य को कुल १५ आज्ञाएं दी दिया है जो निम्न प्रकार हैं  :- 
(१) सृष्टि के आरंभ से परमेश्वर ने एक साथ रहने के लिए नर और नारी करके मनुष्य को बनाया। (धर्मशास्त्र, मरकुस १०:६ )
(२) मनुष्य अपने माता - पिता से अलग रहकर अपनी पत्नी के साथ रहा करेगा और वे दोनों एक तन रहेंगे।(धर्मशास्त्र, मरकुस १०:७ - ८) 
(३) जिसको परमेश्वर ने जोड़ा है उसको मनुष्य अलग न  करे। (धर्मशास्त्र, मरकुस १०:९)
(४) पति अपनी पत्नी का हक पूरा करे और वैसे ही पत्नी भी अपने पति का हक पूरा करे।  (धर्मशास्त्र, १ कुरंथियों ७ :३)
(५ ) मनुष्य अपने पत्नी से अलग न रहे परन्तु केवल कुछ समय तक आपस की सम्मति से अलग रह सकता है ताकि प्रार्थना के लिए अवकाश मिले और फिर एक साथ रहे।  ऐसा न हो कि मनुष्य के असंयम के कारण सैतान उसे परखे। (धर्मशास्त्र, १ कुरंथियों ७ :५)
(६ ) जिनका विवाह हो गया हो उनको परमेश्वर आज्ञा देते  हैं  कि पत्नी अपने पती से अलग न हो।  और किसी कारण यदि अलग भी हो जायँ तो बिना दूसरा विवाह किए ही रहें या फिर अपने पति से पुनः मेल कर लें। (धर्मशास्त्र, १ कुरंथियों ७ :१० - ११)
(७) पति   अपनी पत्नी से अपनी देह के समान प्रेम रखे।  जो अपनी पत्नी से प्रेम रखता है वह अपने  आप से प्रेम रखता है। (धर्मशास्त्र, इफिसियों ५ :२८)
(८) पति पत्नी का सिर होता है। जैसे ईश्वर पुजारी के लिए सिर है और वह ईश्वर स्वयं ही उधारकर्ता है।   (धर्मशास्त्र, इफिसियों ५ :२३)
(9) तुम में से हर एक अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम रखे और पत्नी भी अपने पति का भय  माने।  (धर्मशास्त्र, इफिसियों ५ :३३)
(१०) सब काम बिना कुड़कुड़ाए करे और बिना विवाद के किया करे।  (धर्मशास्त्र, इफिसियों २ :१४)
(११) तुम्हारा चाल - चलन ईश्वर के शुभ समाचार के योग्य हो चाहे ईश्वर आपको आकर देखे या न देखे। आपके बारे में सुनें कि आप एक ही आत्मा में स्थिर हो और एक चित होकर शुभ समाचार के विश्वास के लिए परिश्रम करते हो ।  (धर्मशास्त्र, फिलिप्पियों ९ :२७)
(१२) किसी भी बात की चिंता मत करो परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना, विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के  सामने उपस्थित करो। (धर्मशास्त्र, फिलिप्पियों ४ :६)
(१३ ) उत्तम स्त्रियों को कुल बारह (१२) आभूषण धारण करना चाहिए। उत्तम स्त्रियों का पहला आभूषण क्या है ? रूप। दूसरा आभूषण क्या है ? शील। तीसरा आभूषण क्या है ? सत्य। चौथा आभूषण क्या है ? सदाचार। पांचवाँ आभूषण क्या है ? धर्म। छठा आभूषण क्या है ? सतीत्व। सातवां आभूषण क्या है ? दृढ़ता। आठवां आभूषण क्या है ? साहस। नौवां आभूषण क्या है ? मंगल गान। दसवां आभूषण क्या है ? कार्य - कुशलता। ग्यारहवां आभूषण क्या है ? काम का  आधिक्य। बारहवां आभूषण क्या है ? मीठे वचन।
(१४) मनुष्य को  अपने हृदय में बैठा लेना है  कि एक मात्र भगवान नारायण श्री कल्कि जी ही सर्वोत्तम धर्म हैं ।  उनसे बढ़ कर न कोई धर्म है और न कोई तीर्थ। (पद्म पुराण पेज नं - २५३)
(१५) जो आपने मस्तक पर भवान श्री विष्णु का चरणोदक धारण करता है उसको स्नान करने की आवश्यकता नहीं है । जो मनुष्य आपने हृदय में श्री हरी के चरण कमलों को /चरण पादुका को स्थापित कर लिया है उसको यज्ञ करने की जरूरत नहीं है।  (पद्म पुराण पेज नं - ४०३)  
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