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Monday, 31 August 2015

परमेश्वर आपकी सुनेंगे पर कैसे ?

परमेश्वर के हजारों आँखें हैं। परमेश्वर के हजारों कान हैं। सारी सृष्टि उन्हीं के अन्दर समाई हुई है और सभी जीवों में केवल उन्हीं एक परमात्मा की आत्मा बसती है। इसलिए आपके प्रत्येक दुःख - दर्द और प्रत्येक पड़ेशानी को वे जानते हैं। उनसे कोई भी चीज छिपी नहीं है। वे बहुत ही सामर्थ्यवान  हैं। वे बहुत ही शक्तिशाली हैं । वे आपके दुखों को आनंद में बदल सकते हैं। वे आपके पड़ेशानियों को आनंद में बदल सकते हैं। वे आपके आँशुओं को आशीष की बरसात में बदल सकते हैं। वे परमेश्वर दुखी व्यक्ति  को तुच्छ नहीं मानते  और न उससे घृणा करते हैं और न वे उससे वे मुख छिपाते हैं पर जब किसी ने भी उनको पुकारा उनकी उन्होंने सुन ली। (धर्मशास्त्र, भजन संहिता २२ :२४ ) अब सबाल यह उठता है कि  परमेश्वर आपका क्यों नहीं सुनते हैं ? क्योंकि  आपका परमेश्वर तक पहुँचने का यानि कि  वे आफ एप्रोच गलत है। मनुष्य ने परमेश्वर की पूजा करना छोड़  दिया और जो अर्धदेवता हैं उनको अपना परमेश्वर मान कर उनकी पूजने करने लगे। इन अर्ध देवों  के पास कोई अपनी शक्ति नहीं है। ये अर्ध देव उसी परमेश्वर से शक्ति से पाते  हैं जिसकी आपने पूजा करना छोड़ दिया और तब फिर वे आपके प्रारब्ध के अनुसार फल उस अर्ध देव को आपको देने हेतु प्रदान करते हैं और तब वह अर्ध देवता आपको फल देते हैं। इसलिए आपको इस अर्ध देवताओं से जो कुछ भी फल मिलता है वह कुछ दिनों के बाद  नष्ट हो जाता है। इनके द्वारा जो भी फल मिलता है वह टेम्प्रोरी है। और आपकी हालत फिर वैसे की वैसे ही दुःख़मय बनी रह  जाती है। परमेश्वर ने कहा कि मनुष्य जिस रीति से पूजा करता है वह पूजा ही अविधि पूर्वक है। (गीता ७:२१-२३; ९ :२३) जो पूजा ही  अविधि पूर्वक है तो उस पूजा का अच्छा फल किस प्रकार मिलेगा ? मनुष्य किस प्रकार दुःख - दर्द से बहार निकलेंगे ? अतः मनुष्य का पूजा करने का तरीका ही गलत है जिस कारण मनुष्य दुःख पाता  है। धर्मशास्त्र, यिर्मयाह २:१३ में ईश्वर ने कहा कि मेरी प्रजा ने दो बुराइयांकी है - (१) उन्होंने मुझको छोड़ दिया ( मैं तो बहते जल के सोते के सामान हूँ ) और (२) उन्होंने अपने लिए हौद बना लिए वरन  ऐसे हौद जो टूट गए हैं और  जिनमें जल नहीं रह  सकता ।
परमेश्वर ने  मनुष्य  पूछा कि "तू क्यों नया मार्ग पकड़ने के लिए इतना डामाडोल होते हो ?" (धर्मशास्त्र, यिर्मयाह २: ३६) परमेश्वर  ने मनुष्य से कहा कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय में करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि के नहीं, वरन  कुशल के हैं,  अंत में मैं तुम्हारी आशा पूरी करूंगा (धर्मशास्त्र, यिर्मयाह २९:११) लेकिन मनुष्य ने परमेश्वर का कहना नहीं माना। तब परमेश्वर ने मनुष्यों को चेतावनी देते हुए कहा कि - ढ़ीले हाथों को दृढ करो और  थरथराते हुए घुटनों को स्थिर करो। घबराने वालों से कहो, मत डरो ! देखो तुम्हारा परमेश्वर पलटा लेने और प्रतिफल देने के लिए आ रहा है। (धर्मशास्त्र, यशायाह ३५ :३-४ ) देखो आज वह परमेश्वर आपने लाखों पवित्रों के  साथ आया है  ताकि सबका न्याय करे और सब भक्तिहीनों को उनके अभक्तिपूर्वक किये गए सब कामों के विषय में, जो उन्होंने भक्तिहीन होकर किये हैं, और उन सब कठोर बातों के विषय में जो भक्तिहीन पापियों ने उसके विरोध में कही है, उसको दोषी ठहराए। (धर्मशास्त्र, यहूदा १:१४-१५ )
देखो आज वे परमेश्वर अपने नए नाम कल्कि नाम से पिता विष्णु यश और माता सुमति के घर अवतार लेकर गावं सम्भल में आए  हैं और जो कोई उनका आश्रय लेगा और उसके नाम का संकीर्तन करेगा वह भाव से पार हो जाएगा। भगवान कल्कि जी का नाम वह अमृत है जो मनुष्यों को अनंत जीवन देता है। 
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