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Tuesday, 4 August 2015

परमेश्वर की प्राप्ति में निष्काम प्रेम की क्या भूमिका है ?

जो परमेश्वर से प्रेम करता है,  परमेश्वर उसी को अपना मान बैठते हैं। और परमेश्वर जिसको अपना मानते हैं केवल उसी को अपना असली रूप दिखाते हैं। कली के शासन काल में परमेश्वर ने अपना नाम आप लोगों के आगे तो प्रकट कर  रखा है परन्तु अपना रूप छिपा रखा है।  जब आप परमेश्वर की प्रेम सहित भक्ति करेंगे तब परमेश्वर आप को अपने स्वरूप का दर्शन कराएँगे। इसलिए गीता में अनेक जगह परमेश्वर के दर्शन के लिए प्रेम - भक्ति दोनों का जिक्र किया गया है।     
यह अक्षरः सत्य है कि यदि आप ज्ञानी  हैं परन्तु आप परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं तो आप परमेश्वर के  स्वरूप का दर्शन नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि आप परमेश्वर का अनुभव भी नहीं कर सकते हैं। इस बात को याद रखें कि मांगने से प्रेम की धारा टूट जाती है, प्रेम का प्रमाण घटने लगता है। ईश्वर से धन मांगोगे तो तुमको मिलेगा। जितना मांगोगे उतना मिलेगा किन्तु निष्काम प्रेम करने वालों से ईश्वर आमने - सामने मिलेंगे। परमेश्वर से कुछ मांगोगे तो प्रेम खंडित होगा। मांगने से सच्चा प्रेम का गौरव घटता है। सच्चा प्रेम करने वाला प्रेमी से कभी भी कुछ नहीं मांगता है। परमेश्वर के पास आइये किन्तु कुछ मांगने के लिए नहीं बल्कि उनसे मिलने के लिए। क्योंकि निष्काम भक्ति उत्तम है। तुम्हें कोई भी कुछ नहीं दे सकता है।  तुम्हें जो  मिलता है तो बस अपना प्रारब्ध मिलता है। झूठ -मूठ के बाबा, मंदिर के मूर्ती को अपना दाता  मान बैठते हो  और ईश्वर को छोर कर उनकी पूजा करने लगते हो। तुम्हारे दुःख का कारण तुम्हारा प्रारब्ध है और तुम्हारे सुख का कारण भी तुम्हारा प्रारब्ध ही है। तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा तो परमेश्वर तुम्हारे सामने आएँगे।  इतना अवश्य याद रखना कि निष्काम भक्ति परमेश्वर को प्रसन्न करती है और यह भी याद रखना कि बिना ज्ञान की भक्ति अंधी है और बिना भक्ति के ज्ञान पंगु है।
मेरा पथ वृताकार है और मैं उसी पथ पर चलता हूँ। मेरी रचना का पथ वृताकार है। जैसे दिन के बाद फिर रात और रात के बाद दिन, गर्मी के बाद बरसात और बरसात के बाद सर्दी आती है । ठीक इसी तरह वर्ष, महीने, युग बीतने के बाद मैं आता हूँ। आज मैं तुम्हारे पास खड़ा हूँ।  फिर अनेकों वर्ष बीतने के बाद जब एक चक्र पूरक होगा तब फिर मैं तुम्हारे सामने खड़ा मिलूंगा। मैं तुमसे प्रेम की बातें कर रहा था।  जो कोई प्रेम करता है वह परमेश्वर से जन्मा है और परमेश्वर को जानता है। जो प्रेम नहीं रखता है वह परमेश्वर को नहीं जानता है क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। प्रेम में भय नहीं होता वरन  प्रेम भय को दूर करता है। प्रेम एक दुसरे के बीच नजदीकियां लाती है। नफ़रत तो दुःख, तकलीफ, झगड़ा और मानसिक तनाव उतपन्न करता है परन्तु  मानसिक सुख प्रदान करता है। प्रेम डिप्रेशन को खत्म करता है, प्रेम चिंता को दूर करता है, प्रेम आनंदमय जीवन प्रदान करता है।
प्रेम सुनने में बहुत छोटा है, प्रेम शब्द लिखने में बहुत छोटा है परन्तु इसका अर्थ बहुत ही बड़ा है। प्रेम बहुत कठिन है। प्रेम अंतरात्मा की उपज है। इसको केवल अनुभव किया जासकता है। प्रेम में हर कीमती से कीमती वस्तु का और सब रिश्ते - नाते का मोल कम हो जाता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब प्रेम इतना अच्छा चीज है तो संसार में सबसे पहले प्रेम किसने किया ?  वह सबसे पहला कौन  है जिसने सर्व प्रथम प्रेम किया और किससे प्रेम  किया ? संसार में सबसे पहले प्रेम परमेश्वर ने मनुष्य से किया। इसलिए मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है। परमेश्वर ने मनुष्य को आज्ञा देते हुए कहा कि जैसा प्रेम मैंने तुमसे किया वैसा ही प्रेम तुम दुसरे से करो।
ईश्वर आपको निःस्वार्थ मदद करना चाहते हैं।  आप ईश्वर से कहें कि  हे प्रभु , प्रेम करने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ तो उसी समय आपका भय, आपकी पड़ेशानी, आपका संकट खत्म हो जाएगा। ईश्वर आपको नया नाम देंगे जिससे आपको पता चलेगा कि ईश्वर आप से प्रेम करने जा रहे हैं। ईश्वर आपका नाम बदल कर "आशीष देने वाला " रखने जा रहे हैं।
हे मनुष्य ! तुम अपने धोखेवाज मन के कैद से भाग। तुम धर्म, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धीरज और नम्रता का पीछा कर। तुम विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़ और उस अनंत जीवन को धर ले जिसके लिए तू बुलाया गया है। इन बातों की सुधि तुम लोगों को दिला और प्रभु के सामने चिता दे कि शब्दों पर तर्क - वितर्क न किया करें। इनसे कुछ लाभ नहीं होता, बल्कि इससे सुनने वाले बिगर जाते हैं। अपने आपको परमेश्वर का ग्रहण करने योग्य और ऐसा काम करने वाला ठहरो जिससे तुम लज्जित न होने पाओ। विश्वास के द्वारा प्रभु के मन में वसो और प्रेम में जड़ पकर लो। यह भलीभांति समझने की कोशिस करो कि प्रेम की लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई कितनी है ?
हे मनुष्य ! आप ऐसा उपाय करें जिससे कि परमेश्वर में प्रेम उतपन्न हो जाय। मैं तुम्हारे सामने मोड़ - मकुट पहन कर, हाथ में बांसुरी लिए हुए नहीं मिलूंगा, मैं तुम्हारे सामने हाथ में त्रिशूल लेकर नहीं आऊंगा।  मैं तो अनेकों रूप में इसी तरह तुसे मिला करूंगा। यदि आज तुम मेरी बातें सुनोगे तो भव सागर से पार हो जाओगे, यदि तुम आज मुझको छोर दोगे  तो  आवा  - गमन में फस जाओगे, लख चौरासी में जाओगे। देख आज मैं तेरे द्वार पर खड़ा, तेरे द्वार को खटखटा रहा  हूँ। यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा तो मैं उसके लिए मुक्ति का द्वार खोल दूँगा।    
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