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Tuesday, 25 August 2015

आसानी से आप परमेश्वर को कैसे प्राप्त करेंगे ?


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जो मनुष्य परमेश्वर में अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर परमेश्वर को स्मरण करता है उस नित्य - निरन्तर परमेश्वर में युक्त हुए मनुष्य को परमेश्वर आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। गीता ८:१४ में इस बात की घोषणा परमेश्वर ने अपने मुख से किया है।
गीता ८:८-१३ वें श्लोक तक सगुन - निराकार और निर्गुण - निराकार का स्मरण करना बताया गया है। इन दोनों स्मरणों में प्राणायाम की मुख्य विशेषता दर्शायी  गई है जिसको सिद्ध करना कठिन है। अन्तकाल जैसी विकट अवस्था  में भी प्राणायाम बल से प्राणों को दोनों भौं के मध्य में स्थापित करने की  जो बात गीता ८:६, १०, १२ - १३ में  कही गई है  ऐसा करना प्रत्येक मनुष्य के लिए काफी कठिन है। क्योंकि अन्तकाल की अवस्था  में मृत्यु भय की सत्ता चरम सीमा पर होती है। उस समय मनुष्य के शरीर में अनेक  प्रकार के (complication) दुःख एवं कष्ट प्रकट होने लगते हैं। ऐसे कष्टप्रद स्थिति में किसी भी मनुष्य के लिए प्राणायाम के बल से प्राणों को दोनों भौं के बीच में स्थापित करना संभव नहीं है। परन्तु परमेश्वर को स्मरण करने में कोई कठिनाइ  नहीं है। परमेश्वर को स्मरण करने में इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि की भी जरूरत नहीं है। इसमें अन्तकाल में प्राण आदि को लगाने की जरूरत नहीं है।  जिस प्रकार किसी वस्तु का इन्सुरेंस (Insurance) होने पर वस्तु के बिगरने, टूटने - फूटने की चिंता नहीं रहती है ठीक उसी प्रकार शरीर - इन्द्रियाँ,  मन - बुद्धि सहित अपने आपको परमेश्वर में समर्पित कर देने पर मनुष्य को अपनी गति के विषय में कभी किंचित मात्र भी चिंता नहीं होती। इसका कारण यह है कि साधन क्रियाजन्य अथवा अभ्यासजन्य नहीं है। इसमें तो वास्तविक सम्बन्ध की जागृति है। इसमें कठिनता का नामोनिशान नहीं है। इसी से इस साधन को अपनाने से परमेश्वर अपने  आप की प्राप्ति सुलभ बताया है।
उपरोक्त साधन में भक्त की दृष्टि एक परमेश्वर के सिवा  अन्य किसी और की सत्ता पर न होने से उसका मन परमेश्वर को छोड़कर अन्य जगह नहीं जापाता  है । इसलिए वह स्वतः अनन्यचित्त वाला हो जाता है। एक करना होता है और एक होना होता है। जो करते हैं वह क्रिया है। जो अपने आप होता है वह स्मरण है। स्मृति क्रिया नहीं बल्कि परमेश्वर के साथ अपने नित्य संबंध की स्वतः होने वाली स्मृति है। परमेश्वर में अपनापन होने से स्वतः परमेश्वर में प्रेम होता है और जिससे प्रेम होता है, उसका स्मरण अपने आप और नित्य - निरंतर होता है। जब परमेश्वर का स्मरण नित्य - निरंतर हुआ तो परमेश्वर की प्राप्ति बड़ी आसानी से हो जाती है।
मनुष्य का भाव जब ऐसा हो जाय कि उनके साधन और साध्य केवल परमेश्वर ही हैं अर्थात केवल परमेश्वर के शरण होना है, केवल परमेश्वर का ही चिन्तन करना है, केवल उन्हीं की उपासना  करनी है और केवल उन्हीं को प्राप्त करना है।  परमेश्वर के लिए  ऐसा  दृढ़ भाव जब हो जाय कि परमेश्वार के सिवा  कोई अन्य  नहीं तो दुसरे के लिए भाव हो ही नहीं सकता क्योंकि परमेश्वर के  आलावा जो कुछ भी है वह सब नाश होने वाला है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के मन में परमेश्वर के सिवा  कोई इच्छा ही   नहीं उठेगी, अपने जीवन निर्वाह की भी नहीं । इसलिए वे अनन्य हैं। वे खाना - पीना, चलना - फिरना, बातचीत करना, व्यवहार करना आदि जो कुछ भी काम करते हैं, वह सब परमेश्वर की ही उपासना है क्योंकि सब काम परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए ही करते हैं।
जो अनन्य होकर परमेश्वर का ही चिंतन करते हैं और परमेश्वर की प्रसन्नता के  लिए ही सब काम करते हैं यानि  कि संसार से विमुख हो गए हैं - यह अनन्यता है। जो  परमेश्वर के सम्मुख हो गए हैं - यह उनका चिन्तन  है। और जो सक्रिय - अक्रिय सभी अवस्था में भगवत्सेवा परायण  हो गए हैं - यह उनकी उपासना है। ये तीनों बातें जिनमें हो जाती है वे नित्याभियुक्त है।
परमेश्वर के अनन्य भक्त  ३३  करोड़ देवी - देवताओं की उपासना नहीं करते। ३३  करोड़ देवी - देवताओं की पूजा करने वाले तो कामना की प्राप्ति  के लिए ही पूजा करते हैं और उन्हें कामना के  अनुसार ही सीमित फल मिलता है। परन्तु एक मात्र परमेश्वर की पूजा करने वाले को असीमित फल मिलता है। देवताओं के उपासक तो मजदूर की तरह हैं  और परमेश्वर की उपासना करने वाला घर के सदस्य की तरह है। मजदूर काम करता है तो उसको मजदूरी के अनुसार सीमित रूपये मिलते हैं; परन्तु घर का सदस्य काम करता है तो सब कुछ उसी का होता है। जो अनन्य भक्त  हैं और जिनकी दृष्टि में एक परमेश्वर के सिवा  दुसरे की सत्ता नहीं है, परमेश्वर ने ऐसे भक्तों के लिए   कहा है की उन भक्तों का योग और क्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।  
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