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Monday, 24 August 2015

ब्रह्म-ज्ञान

ब्रह्म - ज्ञान सबसे हाइयेष्ट क्वालिटी का  ज्ञान है। इसको  जान लेने के बाद संसार में और कोई भी  ज्ञान जानने के लिए शेष नहीं रह  जाता है। ब्रह्म - ज्ञान सब विद्द्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है। ब्रह्म-ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए और दूसरा कोई उपाय नहीं है। ब्रह्म -ज्ञान कोई  कर्म नहीं है। उस परब्रह्म को जानकर ही मनुष्य जन्म - मरण को लाँघ जाता है।   ब्रह्म-ज्ञान व ब्रह्म -विद्द्या का  मुख्य फल परब्रह्म की प्राप्ति है जो जन्म, जरा आदि विकारों को न प्राप्त होने वाला, अजर-अमर, समस्त पापों  से रहित तथा कल्याणमय दिव्यगुणों से सम्पन्न है।
जिसप्रकार यज्ञ आदि कर्मों का फल स्वर्ग लोक में जाकर  पुनः पृथवी पर आना है ठीक उसी प्रकार ब्रह्म - ज्ञान का फल जन्म -मरण से छूट कर परमेश्वर को प्राप्त हो जाना है।
 जो मनुष्य भोगों से सर्वथा विरक्त होकर उस परब्रह्म परमात्मा को साक्षात्कार करने के लिए तत्पर है, उन्हें परमात्मा की प्राप्ति होने में विलम्ब नहीं हो सकता। शरीर के रहते - रहते उसको यहीं पर परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है। यह निश्चित है कि जिन्होंने परब्रह्म परमात्मा के स्वरुप का निश्चय कर लिया है और कर्मफल रूप समस्त भोगों को त्याग दिया है वह इस शरीर का नाश होने से पहले ब्रह्म को  प्राप्त कर लेता है।  संक्षिप्त महाभारत, शांति पर्व, पेज ० न ० १२५६ में  यह भविष्यवाणी किया गया है कि स्त्री हो या पुरुष, जो ब्रह्म को जान लेता है तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। यदि ब्रह्म-ज्ञान  की प्राप्ति हो जाय और मनुष्य कामना को छोड़   दे तो वह बिना मरे (Without Death) इसी शरीर में मुक्ति पा  जाता है।
श्रीमद्भगवतम् महा पुराण ११;२९ :१८ में श्री भगवान ने उद्धव जी से कहा की जब ब्रम्ह विद्द्या का अभ्यास किया जाता है तब  थोड़े   ही दिनों में लोगों को ज्ञान होकर सब कुछ ब्रह्म स्वरुप दिखने लगता है। ऐसी दृष्टि हो  जाने पर सारे संशय - संदेह अपने आप निवृत हो जाते हैं और वह सब जगह ईश्वर का साक्षात्कार करके संसार  दृष्टि से उपराम हो  जाता है।
श्रीमद्भगवतम् महा पुराण ११;२९ :२६ में श्री भगवान ने कहा  कि "जो पुरुष परमेश्वर के भक्तों को ब्रह्म - विद्द्या को भलीभाँति स्पष्ट करके समझायेगा, उस ज्ञान दाता  को  मैं प्रसन्न मन से अपना स्वरुप तक दे डालूँगा। "

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