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Monday, 10 August 2015

मुक्ति प्राप्ति के रहस्य


रहस्य का अर्थ होता है छिपा हुआ या गुप्त। यदि छिपा हुआ न हो तो रहस्य कहा  ही न जायेगा।  लोगों को मुक्ति क्यों नहीं मिलती है ? क्योंकि मुक्ति को प्राप्त करने का तरीका गुप्त है। हे भाई! देखो, नौका को तो जल में ही रहना है, किन्तु यदि जल नौका पर सवार हो जाय तो नौका डूब जाती है। ठीक उसी प्रकार मन को संसार में ही रहना है, किन्तु यदि मन को संसार के स्वरूप से हटा कर, मन को विषयों से हटा कर जब परमेश्वर में मिला  दिया जाता है तो तभी मुक्ति मिल जाती है।
यदि सांसारिक वस्तु या  सांसारिक  रुप या  सांसारिक विषय मन में आकर बैठ जाय तो मुक्ति कभी भी नहीं मिलेगी। जीवात्मा तन को छोड़ता है  किन्तु वह मन को साथ ले चलता है। इसलिए मन को संभालो। पूर्व जन्म का शरीर तो मर गया है किन्तु मन नया शरीर लेकर आया है। शरीर तो मरता है किन्तु मन नहीं मरता है। मन को मरने के लिए ही मैं आपको परमेश्वर का ध्यान, परमेश्वर का चिंतन, परमेश्वर के स्वरूप का मनन करने के लिए ही अभ्यास करने को कहता हूँ। परन्तु आपका मन रुपया, पैसा, व्यापार, सुख - दुःख और सांसारिक  वस्तु में फस जाता है।  इसलिए मैंने तुमसे कहा कि जो वस्तु तुमको बांध लेती है, अपने में फसा लेता है, उसको परमेश्वर को दान देदो। मेरी बात आप  मानते हैं  नहीं इसी कारण आपको मुक्ति नहीं मिलती है।
उपरोक्त सत्य में आँख मूंदने की जरूरत नहीं है, नाक पकड़कर प्राणायाम करने की जरूरत नहीं है। मन का निरोध तो तब होता है जब किसी का उसके द्वारा विरोध नहीं होता है। मन का निरोध होने पर मुक्ति अनायास ही मिल जाती है।  इसलिए कहा जाता है कि दान यदि बायाँ हाथ दे तो दाहिना हाथ भी न जाने ताकि मन का विरोध न हो। बंधन में कौन है ? मन। मुक्ति किसकी  होती है ? मन की। आत्मा तो स्वयं मुक्त है। आत्मा किसी भी काल में न तो जन्मता ही है और न मरता ही है। तथा यह उत्तपन्न   हो कर फिर न  होने वाला ही है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। (गीता  २:२०) जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे  नए वस्त्रों को धारण करता है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा पुराने शरीर को त्याग कर दुसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। (गीता २:२२) इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको आग जला नहीं सकती, इसको जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता। (गीता २:२३) विषयों का बार - बार चिंतन करते रहने से मन उसमें फस जाता है और बंध जाता है। इसलिए मुक्ति किसको चाहिए ? मन को।  आत्मा को मुक्ति नहीं चाहिए।
एक घड़ा रखा था क्योंकि उसका मुंह छोटा था ।  उस घड़े में किसी ने चना रख दिया। बंदर ने उस घड़े में से चने निकालने के लिए हाथ अंदर डाला। जब वह मुट्ठी में चने पकड़ कर घड़ा से हाथ बाहर निकालना चाहा तो हाथ घड़े से बाहर निकाल नहीं पारहा  था। इस कारण बंदर जोर - जोर से चिल्लाने लगा। सभी बंदर चीख सुनकर जमा हो गए। सभी बन्दरों  ने कहा  कि भूत ने हाथ को बांध लिया है। यदि मुठ्ठी खोल देता तो हाथ बाहर आ जाता, किन्तु वह चना को छोड़ना चाहता नहीं था और केवल चिल्लाता था - घड़े के अंदर भूत है।
संसार भी एक वैसा ही घड़ा  है। काल ने उस घड़े में सांसारिक विषय रख दिया है । विषय ही चना है और मन है बंदर के । मनुष्य विषयों रूपी चना को पकड़ रखा है। वह स्वयं ही विषय को नहीं छोड़ना चाहता है और वह चिल्लाता है - मुझको मुक्ति नहीं मिलती।  यदि मुक्ति  चाहिए तो मुट्ठी खोल दो। अर्थात यदि मुक्ति चाहिए तो विषय को जो मुट्ठी  से पकड़ रखे हो उसको  छोर दो। यदि मुक्ति चाहिए तो इसके लिए यह पता करो कि यह मन किस चीज में विलीन होता है । यदि इसको पता करने में आप समर्थ्य नहीं हैं तो मैं आपको बताता हूँ कि यह मन  किस चीज में विलीन होता है ? यह मन केवल एक मात्र  परमेश्वर में ही विलीन हो सकता है। इसलिए मन को केवल एक मात्र परमेश्वर में ही लगाओ आपको मुक्ति अवश्य ही मिल जाएगी।  

2 comments:

DILIP KUMAR said...

Hm sb manushay ko kewal parbhu ka dhayan karna chahiye.

DILIP KUMAR said...

Parbhu ka kewal ghayan karne se bhav se par ho jane ka sabse achha aur sugam rasta aur koi nahi hai.