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मरने के बाद क्या होगा ?


मृत्यु बहुत ही खराब चीज होती है। मृत्यु का भय सभी को है। चाहे वह गरीब हो या अमीर, बलवान हो या निर्बल, नास्तिक हो आस्तिक, पंडित हो या काजी। मृत्यु के आगे किसी का भी  वश  नहीं चलता है। जब मृत्यु का समय आता है तब किसी को भी पता नहीं चलता है कि  वह कब आया और जीव को कहाँ ले गया ? इसके आने का कोई निश्चित समय नहीं होता है। वह बहुत ही बलवान है, वह बहुत ही सामर्थ्यवान है। वह सबके बीच में से जीव को बलपूर्वक उठा कर  इस प्रकार ले जाता है कि किसी को भी यह पता नहीं चल पाता कि वह जीव को कहाँ ले गया ? उसके आगे सभी घुटना टेक देता है।
धर्मशास्त्र यह कहता है कि देह का स्वामी जीवात्मा मन, बुद्धि, अहंकार को समेट  कर  नए शरीर में चला जाता है। वह जीवात्मा श्रोत्र (कान), चक्षु (आँख), त्वचा, रसना (जीभ), घ्राण (नाक), और मन को आश्रय करके अर्थात इन सबके सहारे से  ही विषयों का सेवन करता है। (गीता १५ :९ ) 
ईश्वर ने गीता १५:८ में कहा कि वायु गंध के स्थान से गंध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है ठीक उसी प्रकार देह का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है उससे मन  सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर नए शरीर में चला जाता है।
ईश्वर ने कहा  कि  इस नाश रहित, अप्रमेय, नित्य स्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान हैं। (गीता २:१८) आत्मा किसी भी काल में न तो जन्मता ही है और न मरता ही है। तथा यह उत्तपन्न   हो कर फिर न  होने वाला ही है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। (गीता  २:२०) जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे  नए वस्त्रों को धारण करता है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा पुराने शरीर को त्याग कर दुसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। (गीता २:२२) इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको आग जला नहीं सकती, इसको जल गला नहीं सकता और वायु सुख नहीं सकता। (गीता २:२३) लेकिन जीव जब शरीर का त्याग करने लगता है तब उस समय शरीर में इतना पीड़ा होता है जैसे हजारों बिच्छु एक साथ डंक मर दिया हो। इस प्रकार जीव बड़ा ही कष्ट पाकर इस शरीर को छोड़ता है।
गरुड पुराण, धर्मकांड, प्रेतकल्प, शीर्षक "मरनासन्न व्यक्ति के लिए किये जाने वाले कर्म" पेज नं - ४४२ में यह कहा  गया है कि  जब मृत्यु आती है तो उसके कुछ समय पूर्व दैवयोग से कोई रोग प्राणी के शरीर में उतपन्न हो जाता है। इन्द्रियाँ विकल हो जाती है और बल, ओज  तथा वेग शिथिल होजाती है। इसके बाद चेतना समाप्त होजाती है। इसके बाद यम के दूत उसके समीप आकर खरे हो जाते हैं और उसके प्राणों को बलपूर्वक अपनी ओर  खींचना शुरू कर देते हैं। उस समय प्राण कंठ में आजाते हैं। उसका मुँह लार से भर जाता है। उसके बाद शरीर के भीतर रहने वाला अंगुष्ठ परिमाण का पुरूष हाहाकार करता हुआ तथा अपने  घर को देखता हुआ यम के दूतों के द्वारा यमलोक लेजाया जाता है।
मृत्यु के समय शरीर में प्रवाहित वायु प्रकुपित होकर तीब्र गति को प्राप्त करता है और उसी की शक्ति से अग्नि तत्व प्रकुपित हो उठता है ।बिना ईंधन के प्रदीप्त ऊष्मा प्राणी के मर्म स्थानों का भेदन करने लगती है जिसके कारण प्राणी को अत्यंत कष्ट की अनुभूति होती है। परन्तु भक्तजनों एवं भोग में अनसक्त जनों की अधोगति का निरोध करने वाला उदान नमक वायु  उर्ध्व गति वाला हो जाता है। जो कामना, सदाचारी, और सौम्य हों; जो आसक्ति रहित और केवल ईश्वर में ही मन लगाने वाले हों वे सब निशित ही सुख पूर्वक मरते हैं। लेकिन जो प्राणी भगवान नारायण के भक्त हैं, जो केवल भगवान नारायण के ही आधीन हैं, जो केवल नित्य दिन तथा निरन्तर भगवान नारायण  को ही स्मरण करते  हैं , और उस ईश्वर के ध्यान आदि में लगे  रहते हैं  तो उनकी मृत्यु नहीं होती है, उनके पास यम के दूत प्राण हरण करने के लिए नहीं आते हैं बल्कि उनके पास स्वयं धर्मराज फूलों के  हार लेकर आते हैं और उनको फूलों का हार पहनकर भगवान नारायण के निजधाम में जाने के लिए आदेश देते हैं।जो संसारिक  लोग हैं उनको यम के दूत घसीट कर वैतरणी नदी को पार कराता हुआ, १६ पुरियों को पार कराता हुआ यमलोक ले जाते हैं।
गरुड पुराण, धर्मकांड, प्रेतकल्प, शीर्षक "मरनासन्न व्यक्ति के लिए किये जाने वाले कर्म" पेज नं - ४६८ यह कहता है कि पृथ्वी लोक  से यमलोक की दूरी ८६००० योजन है। चुकि  एक योजन में १२ किलो मीटर होता है इसलीए ८६००० योजन में १०,३२,००० किलो मीटर होगा। अर्थात पृथ्वी लोक से यमलोक की दूरी १०,३२,००० किलो मीटर है। यमलोक की इस यात्रा में जीव सर्प की तरह यमदूत के द्वारा पकड़ लिया जाता है और पकड़े हुए बंदर के समान अकेला ही यमलोक के मार्ग पर चलता जाता है। जो प्राणी जीवन भर पाप किया वह इस यमलोक के मार्ग में नानाप्रकार की यातनाओं को भोगता हुआ यमलोक की ओर आगे बढ़ता है।
मृत्यु के तेरहवें दिन के बाद वह पापी यमदूत के कठोर  पाशों में बांध लिया जाता है।  हाथ में अंकुश लिए हुए, क्रोधवेश में तनी हुई भौं से युक्त दण्ड प्रहार करते हुए यमदूत उसको खींचते हुए दक्षिण दिशा में स्थित अपने लोक को ले जाते हैं। यह मार्ग कुश, काँटों, बाँबियों, कीलों और कठोर पत्थरों से भरक होता है। कहीं - कहीं उस मार्ग में अग्नि जलती रहती है, कहीं - कहीं सैकड़ों दरारों से युक्त दुर्गम भूमि होती है, प्रचंड सूर्य की गर्मी और मच्छरों से भरा उस मार्ग में जीव सियारों के समान चीत्कार करते हुए यमदूत के द्वारा खींचे जाते हैं। यमलोक के दारूण मार्ग में चलते हुए जीव के शरीर जलने के कारण अत्यंत क्षीणता को प्राप्त होता है।  अपने कर्मानुसार विभिन्न जंतुओं द्वारा अंगों के खाए जाने, अंगों के भेदन एवं छेदन किये जाने के कारण जीव अत्यधिक दुःख को पता है। इस प्रकार नानाप्रकार का कष्ट भोगता हुआ जीव यमलोक की ओर आगे बढ़ता है।
यमलोक और पृथ्वी लोक के बीच में १६ पूरी है जिससे होकर यातनाएं पाकर ओह जीव यमलोक पहुँचते हैं वह पुरी निम्नलिखित हैं  : 
(१) याम्य :- याम्य के मार्ग में प्रविष्ट होकर जीव हे पुत्र ! हे पुत्र ! मेरी रक्षा करो ऐसा करूण क्रन्दन  करता हुआ अपने द्वारा किये गए पापों को स्मरण करता हुआ आठवें दिन पुष्प भद्रा नदी के पास पहुँचता है। वहाँ  देखने में अत्यंत सुंदर वट वृक्ष हैं जहाँ पर जीव विश्राम करना चाहता है किन्तु यम के दूत वहां विश्राम करने नहीं देते हैं। उसके पुत्रों के द्वारा स्नेह पूर्वक अथवा कृपा पूर्वक पृथ्वी पर मासिक पिंड दान दिया जाता है, उसी को वह खाता है उसके बाद वह सौरी पुरी  के लिए यात्रा प्रारंम्भ करता है।
(२) सौरिपुर:- सौरिपुर में कामधारी इच्छानुसार स्थितिशील एवं गतिशील राजा राज्य करता है। उसका दर्शन करने मात्र से जीव भय  से काँप उठता है। वह जीव यमदूत के खड्ग प्रहार से पीड़ित होकर प्रलाप करता हुआ  नगेन्द्र नगर में पवेश करता है।
(३) नगेन्द्र नगर:- नगेन्द्र नगर में वह दुसरे महीने में बंधू-बांधव के द्वारा दिए गए अन्न को खाकर वह जीव आगे बढ़ता है। आगे बढ़ते हुए जीव के ऊपर यमदूतों के द्वारा कृपाण की मुठियों से प्रहार किया जाता है जिसके कारण वह प्रलाप करता हुआ तीसरे मास के पूरा होते ही गंधर्व नगर में पहुँच जाता है।
(४)गंधर्व नगर:- गंधर्व नगर में तृतीय मास मासिक पिंड को खाकर वह जीव आगे बढ़ता है। मार्ग में यमदूत उसको कृपाण के अग्रभाग से मारते हैं जिसकारण वह जीव विलाप करता हुआ आगे बढ़ता है और चौथे मास में शैलागमपुर पहुंचता है।
(५) शैलागमपुर:- यहां पुत्रों के द्वारा चतुर्थ मासिक श्राद्ध को प्राप्त कर वह जीव सरकते हुए चलता है किन्तु पत्थरों के प्रहार से पीड़ित होकर रोते  हुए वह आगे बढ़ता है और पांचवें मास में क्रौंचपुर पहूँचता है।
(६)क्रौंचपुर:- क्रौंचपुर में पुत्र के द्वारा उनषाण्मासिक श्राद्ध के पिंड और जल का सेवन करके एक घड़ी विश्राम करता है तथा छट्ठे मॉस में वह जीव क्रूरपुर की ओर चल देता है।
(७)  क्रूरपुर :-क्रूरपुर के  मार्ग में यमदूत पटिटशों (अश्त्र - विशेष) के द्वारा मारते हैं जिससे वह जीव गिर पड़ता है और विलाप करता हुआ विचित्र नगर के लिए चल देता है।
(८ ) विचित्र नगर :- विचित्र नगर के मार्ग में यमदूत उस जीव को शूल के प्रहार से आहत कर देते हैं जिसके कारण वह विलाप करता हुआ षण्मासिक पिंड से अपनी क्षुधा को बुझाता हुआ प्रस्थान करता है और सात मास आ जाने पर बह्वापद  नामक पुर में आजाता है।
(९ ) बह्वापद  नामक पुर :-  बह्वापद  नामक पुर में सप्तमासिक पिंड का सेवन करके आगे बढ़ता है।  मार्ग में यमदूत के द्वारा परिघ से आघात किये जाने पर वह जीव विलाप करता हुआ आगे बढ़ता है और आठवें मास में दुःखदपुर पहुंचता है  ।
(१० ) दुःखदपुर :- दुःखदपुर में वह अष्टमासिक पिंड और जल का सेवन कर आगे बढ़ता है। मार्ग में यमदूत के द्वारा मुसलघात से पीड़ित होकर विलाप करता हुआ नानाक्रंद नमक पूरी की ओर प्रस्थान करता है।
इसप्रकार वह जीव क्रमशः  (११ ) नानाक्रंद नमक पूरी (१२ ) सुतप्त भवन (१३) रौद्र पुरी (१४) पयोवर्षण (१५) शीताढ्य पूरी (१६) बहुभीति पुरी को पार करता हुआ यमलोक पहुँचता है।  यहाँ यह  जीव यम के द्वारा बतायी गयी शुभ - अशुभ गति को प्राप्त करता है।
अतः १६ पुरियों को पार कर यमलोक जाते समय जिस बात के लिए मनुष्य पश्चाताप करता है कि हमने हरि का भजन क्यों नहीं  किया, ध्यान क्यों नहीं किया, दान क्यों नहीं दिया, सेवा क्यों नहीं किया, सतकर्म क्यों नहीं किया ? इस मानव शरीर के खत्म होने से पहले यह सब काम कर लें यह सोच करके की ऐसा अवसर फिर नहीं मिलेगा। यूँ तो चारों युगों में हरि के नाम की महिमा गायी गई है किन्तु कलियुग में हरि नाम की महिमा का विशेष महत्व है। कलियुग में हरि का  नाम भव सागर से पार करने का सबसे उत्तम साधन है। इसलिए कलियुग में श्री हरि का नाम क्या होगा यह जान कर नाम सुमिरण एवं नाम संकीर्तन करें।         
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